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डीयू की ओपन बुक परीक्षा : सिर्फ़ 8% छात्र के ही ऑनलाइन मॉक टेस्ट पूरा करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने असंतोष जताया

LiveLaw News Network
1 Aug 2020 5:30 AM GMT
डीयू की ओपन बुक परीक्षा : सिर्फ़ 8% छात्र के ही ऑनलाइन मॉक टेस्ट पूरा करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने असंतोष जताया

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बात पर विचार करते हुए कि पंजीकरण कराने वाले छात्रों में सिर्फ़ 8% छात्र ही पहले ऑनलाइन मॉक टेस्ट की प्रक्रिया को पूरा कर सके दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वे दोनों चरणों के मॉक टेस्ट का पूरा डाटा अदालत में पेश करे ताकि वह कोर्ट को अपनी तैयारी के बारे में बता सके।

न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद की खंडपीठ ने डीयू से कहा है कि दृष्टिबाधितों को लेखक (scribe) उपलब्ध कराने को लेकर वह अपनी स्थिति को स्पष्ट करे।

डीयू ने कोर्ट को उन छात्रों की संख्या के बारे में बताया जिन्होंने मॉक टेस्ट के प्रथम चरण के दौरान ऑनलाइन परीक्षा की प्रक्रिया पूरी की।

इस रिपोर्ट पर ग़ौर करने के बाद कोर्ट ने इतनी कम संख्या में छात्रों के इसमें शामिल होने पर विश्वविद्यालय की खिंचाई की। अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कोर्ट ने कहा,

"पंजीकरण कराने वाले छात्रों में से सिर्फ़ 8% छात्र ही इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर पाए। पीडब्ल्यूडी और दृष्टि बाधितों की श्रेणी में यह संख्या और भी कम है।"

कोर्ट ने कहा कि ये आंकड़े उत्साह पैदा करने वाले नहीं हैं।

दृष्टि बाधित छात्रों को लेखक उपलब्ध कराने के मुद्दे पर कॉमन सर्विस सेंटर अकादमी ने कोर्ट को कहा कि वह दृष्टि बाधितों को लेखक उपलब्ध कराने के लिए ज़िम्मेदार नहीं है और इसका इंतज़ाम दिल्ली विश्वविद्यालय को करना है।

यह सूचना डीयू ने पिछली सुनवाई में कोर्ट को जो बताया था उससे उलट है। उस समय उसने कहा था कि कॉमन सर्विस सेंटर दृष्टिबाधितों को परीक्षा की वास्तविक तिथि से दो दिन पहले लेखक उपलब्ध कराएगा।

जब इस विरोधाभास के बारे में पूछा गया तो विश्वविद्यालय ने कहा कि लेखक को उम्मीदवारों के घर जाने को नहीं कहा जा सकता हालाँकि वे सीएससी को केंद्र पर लेखक उपलब्ध कराने को कहेंगे।

इस भ्रम से नाराज़ कोर्ट ने कहा,

"जब आप सीएससी के रुख के बारे में निश्चित नहीं हैं तो आपने इस प्रावधान को अपने दिशानिर्दशों में क्यों डाला। छात्रों को आपके ठेके संबंधी इकरार की वजह से क्यों मुश्किलों में डाला जाए।"

सीएससी अकादमी ने कोर्ट से आगे कहा कि उसको इस बात की जानकारी नहीं है कि कितने छात्रों ने इस सेवा की माँग की है और इनमें से कितने छात्र दूर दराज क्षेत्र से आए हैं।

दूर दराज के क्षेत्र से आए कितने छात्रों ने सीएससी की सेवाएँ लेने की बात कही है इस बारे में भी दिल्ली विश्वविद्यालय कोई जानकारी नहीं दे पाया।

इसके अतिरिक्त, दृष्टि बाधितों के राष्ट्रीय संघ ने कहा कि लगभग 189 छात्रों ने दिल्ली विश्वविद्यालय को अध्ययन सामग्री, लेखक, और मददगार उपकरणों की माँग के बारे में लिखा था पर उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय से कोई जवाब नहीं मिला है।

जब कोर्ट ने इस बारे में प्रश्न पूछे कि दृष्टि बाधितों की समानतापूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उसकी तैयारी क्या है, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा कि ऐसे छात्रों को बाद में लिखित परीक्षा में सशरीर बैठने का विकल्प खुला है।

इस पर कोर्ट ने डीयू से कहा कि वह दृष्टि बाधित छात्रों से उनका विकल्प नहीं छीन सकते। कोर्ट ने कहा,

'आप जो कर रहे हैं उससे पीडब्ल्यूडी छात्रों को ऑनलाइन परीक्षा में बैठने का समान अवसर मिलने का रास्ता बंद हो जाता है। हम आपको ऐसा नहीं करने देंगे। हम आपको पीडब्ल्यूडी छात्रों को सशरीर परीक्षा देने के लिए बाध्य नहीं करने देंगे।'

कोर्ट : आपने अपने दिशानिर्देश में पीडेबल्यूडी छात्रों के लिए व्यवस्था करने का उल्लेख क्यों किया अगर उन्हें खुद ही ये इंतज़ाम करने थे?

डीयू : अधिकांश छात्र ऑनलाइन परीक्षा के लिए तैयार हैं। दूसरे लोग सशरीर परीक्षा दे सकते हैं

इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जो हलफ़नामा दायर किया था उस पर भी उसकी खिंचाई की। मंत्रालय ने कहा था कि दृष्टि बाधित छात्रों के लिए कॉमन सर्विस सेंटर्स पर किसी भी तरह की विशेष व्यवस्था नहीं की गई है।

इसको देखते हुए, कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि दृष्टि बाधित छात्रों को लेखक उपलब्ध कराने के बारे में वह अपनी स्थिति अगली सुनवाई में स्पष्ट करें।

कोर्ट ने कहा,

'दृष्टि बाधित छात्रों को लेखक उपलब्ध कराना आपका (डीयू) दायित्व है।'

इस मामले की अगली सुनवाई अब 4 अगस्त को होगी।

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