Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

ऑनलाइन धोखाधड़ी और फ्रॉड बड़े पैमाने पर हो रहा है लेकिन कोर्ट स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने चार आरोपियों को जमानत दी

LiveLaw News Network
15 Dec 2021 8:07 AM GMT
ऑनलाइन धोखाधड़ी और फ्रॉड बड़े पैमाने पर हो रहा है लेकिन कोर्ट स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने चार आरोपियों को जमानत दी
x

दिल्ली हाईकोर्ट ने माना है कि ऑनलाइन धोखाधड़ी और फ्रॉड देश में बड़े पैमाने पर हो रहा है, मगर कोर्ट अन्य प्रासंगिक विचारों के अधीन स्वतंत्रता को बनाए रखने के अपने कर्तव्य को निभाने से नहीं पीछे नहीं हट सकती है।

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने चार लोगों मोवीन, वारिस, मानवेंद्र सिंह और साजिद को आईपीसी की धारा 420 के तहत दर्ज एक मामले में जमानत दे दी।

मामले के तथ्य यह है कि शिकायतकर्ता ने कहा था कि उसने ओएलएक्स वेबसाइट पर बिक्री के लिए कुछ सामान अपलोड किए थे। उन्हें मोबाइल से रघुवेंद्र सिंह नाम का एक कॉल आया, जिसने 21,000 रुपये की पेशकश की। जिसके लिए वह सहमत हुई और लेनदेन ऑनलाइन माध्यम से किया जाना था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कुल 34,000 रुपये ट्रांसफर करने के बाद, उसने फोन के जर‌िए कई बार राघवेंद्र सिंह से संपर्क करने का प्रयास किया, मगर संपर्क हो नहीं पाया। उसे संदेह हुआ कि उसके साथ धोखाधड़ी की गई है। इसके बाद उसने एफआईआर दर्ज कराई।

शुरुआती पूछताछ के बाद, यह पाया गया कि 12 वीं कक्षा के एक छात्र ने कहा कि उसने मानवेंद्र सिंह के साथ दोस्ती की, जिसने कथित तौर पर एक बैंक खाता खोलने पर उसे 1,000 रुपये देने का लालच दिया और एक फर्जी नाम और पते के तहत एक फोन नंबर संचालित किया।

इसके बाद छात्र को यूपी से गिरफ्तार किया गया और उसे दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस के सामने अन्य आरोपियों की संलिप्तता का खुलासा हुआ। इसके बाद, आरोप पत्र दायर किया गया और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत संबंधित अपराधों को जोड़ा गया।

याचिकाकर्ताओं की जमानत याचिकाओं को निचली अदालत ने यह देखने के बाद खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं पर गबन का आरोप लगाया गया था और इंटरनेट पर कई निर्दोष व्यक्तियों को धोखा देने के लिए चालाकी से उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था, जिनके लेनदेन की जांच साइबर सेल या आईटी विभाग द्वारा की जा रही थी और यह पहली बार था जब वे पकड़े गए थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि आरोप पत्र दायर किया गया है, वे 10 महीने से हिरासत में थे और उनके खिलाफ सबूत की प्रकृति दस्तावेजी प्रकृति की थी जिसके लिए उनकी हिरासत में उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होगी।

यह तर्क दिया गया था कि यद्यपि याचिकाकर्ता वयस्क थे, लेकिन अपनी युवावस्था में थे और आगे उनका एक अच्छा भविष्य था, विचाराधीन कैदियों के रूप में कैद होने से उन्हें लाभप्रद रोजगार से वंचित किया जाएगा।दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं से फर्जी आईडी देकर सिम कार्ड प्राप्त किए गए थे और आगे उनके खिलाफ जालसाजी का आरोप भी लगाया गया था।

यह तर्क दिया गया था कि जालसाजी के आरोप में 10 साल की सजा का प्रावधान है जो आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है। इसलिए, उन्हें जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

यह देखते हुए कि मामले में चार्जशीट और पूरक चार्जशीट दायर की गई थी, कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ता 10 महीने से न्यायिक हिरासत में हैं। यह न्यायालय जानता है कि देश के अधिकांश हिस्सों में इस तरह की ऑनलाइन धोखाधड़ी और धोखाधड़ी बड़े पैमाने पर हो गई है। हालांकि, यह न्यायालय अन्य प्रासंगिक विचारों के अधीन स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए अपने कर्तव्य को निभाने में चूक नहीं कर सकता है। "

कोर्ट ने आगे जोड़ा,

" चूंकि जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र विद्वान ट्रायल कोर्ट के समक्ष दायर किया गया है और यह ध्यान में रखते हुए कि प्राथमिक रूप से सबूत दस्तावेजी प्रकृति के हैं, इस न्यायालय की राय है कि याचिकाकर्ता को आगे हिरासत में रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। "

इस आधार पर कोर्ट ने चारों को जमानत दे दी।

केस शीर्षक: मोवीन बनाम स्टेट

आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Next Story