Top
Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

अगर नोटरी ने नोटरी अधिनियम के तहत काम न किया हो तो उसे कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकताः मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
24 Jun 2020 10:43 AM GMT
अगर नोटरी ने नोटरी अधिनियम के तहत काम न किया हो तो उसे कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकताः मद्रास हाईकोर्ट
x

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में माना है कि नोटरी अधिनियम, 1952 की धारा 13 के तहत अभियोजन से संरक्षण एक नोटरी के लिए उपलब्ध नहीं होगा, जो अधिनियम के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं करता है।

अधिनियम की धारा 13 में कहा गया है कि "कोई भी अदालत अधिनियम के तहत, अपने कार्यों के अभ्यास या कथित अभ्यास के तहत, सामान्य या विशेष आदेश द्वारा केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत एक अधिकारी द्वारा लिखित शिकायत करने पर, एक नोटरी द्वारा किए गए किसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगी।"

मदुरै बेंच ने "इस अधिनियम के तहत" शब्दों के प्रयोग पर जोर देते हुए, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने कहा,

"नोटरी को अधिनियम के मुताबिक ही कार्य करना चाहिए। यदि ऐसा कार्य करने में कोई दुर्घटना होती है, तो ऐसे तंग करने के लिए किए गए अभियोजन के खिलाफ उसकी रक्षा करने के लिए कानून है। यदि नोटरी कानूनी मार्ग को छोड़ देता है और एक स्वतंत्र रास्ता अख्तियार करता है, तो वह परिणाम का भागी होगा और अधिनियम की धारा 13 की सहायता नहीं ले सकता है।

अदालत ने यह देखा कि यह प्रावधान एक सार्वजनिक नीति द्वारा "अनुप्राणित" है और यह कानून है कि धारा 13 जैसे "सुरक्षात्मक प्रावधान" की अनुपस्थिति में, नोटरी अधिकारी को किसी भी मामले में फंसाया जा सकता है क्योंकि वह व्यक्तिगत रूप, प्रत्येक व्यक्ति, जो उसके पास आता है, के बारे में जानता नहीं होगा।

हालांकि मामले में यह रेखांकित किया गया था, कि बड़ा सवाल इस सुरक्षा की सीमा से संबंधित है।

पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता-नोटरी ऑफिसर ने हाईकोर्ट में अपने ख‌िलाफ आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने की मांग की थी। उस पर शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने सह-अभियुक्त के साथ साजिश की और उसका हस्ताक्षर कर रिजोल्यूशन फर्जी प्रस्ताव बनाया।

यह आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा नोटरी किए गए प्रस्ताव में 23 ट्रस्टियों के हस्ताक्षर थे, जिनमें से एक ट्रस्टी भी शामिल था, जिनकी दो साल पहले मृत्यु हो गई थी।

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि याचिकाकर्ता द्वारा विचाराधीन दस्तावेज को नोटरी रजिस्टर में विधिवत अधिसूचित किया गया था।

कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ता ने यह प्रदर्शित नहीं किया था कि ‌विवादित दस्तावेज उक्त रजिस्टर में उल्लिखित है। यदि ऐसा किया गया होता, तो मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि याचिकाकर्ता ने उच‌ित तरीके से काम किया था और मुख्य आरोपी ने याचिकाकर्ता को धोखा देकर काम कराया। इस मामले में यह बताने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं है कि याचिकाकर्ता का कृत्य वैधानिक दायरे के भीतर था।

अदालत इस बात से संतुष्ट थी कि प्रथम दृष्टया जालसाजी का मामला बनाया गया था और इसके पहले एक ही सवाल था कि "क्या नोटरी के कामकाज का लापरवाह से ‌किया गया निर्वहन अधिनियम की धारा 13 के तहत प्रदत्त सुरक्षा को आकर्षित करेगा।"

स्वामीनाथन ने कहा, "मेरे विचार में, उक्त प्रावधान की उचित समझ "इस अधिनियम के तहत" शब्द में निहित है। दूसरे शब्दों में, नोटरी का कामकाज अधिनियम के तहत किया गया है तो धारा 13 (1) लागू होगा, अन्यथा नहीं।"

उन्होंने कहा, "जब नोटरी अधिनियम, 1952 की धारा 13 पर विचार किया जाता है, तो "इस अधिनियम के तहत" शब्द को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है या उसे खत्म नहीं किया जा सकता है। वैधानिक प्रावधान का कोई भी हिस्सा विचार से बाहर नहीं रह सकता है। इसलिए, मुझे लगता है कि यदि नोटरी ने नोटरी अधिनियम, 1952 के तहत अपने कार्यों का निर्वहन किया है तो वह अधिनियम की धारा 13 का लाभ ले सकता है। "

मामले में प्रतापराय त्रुम्‍बकलाल मेहता बनाम जयंत नेमचंद शाह व अन्य, एआईआर 1992 बॉम्‍बे 149 पर भरोसा कायम किया गया। अदालत ने ज्ञान सिंह बनाम राज्य, (2010) 114 DRJ 343 में दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसके तहत जज ने इसी तरह की एक याचिका में राहत देने से इनकार कर दिया था क्योंकि उस मामले में शामिल दस्तावेज की नोटरी रजिस्टर में कोई प्रविष्टि नहीं थी।

न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा, "धारा 13 उन नोटरी के बचाव में नहीं आएगी, जो अपने कार्य को अंजाम देने की प्रक्रिया में क़ानून में निर्धारित प्रक्रिया और नियमों का उल्लंघन करते हैं।"

ऑर्डर डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करे



Next Story