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अगर पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं तो तीसरे बच्चे की दूसरी डिलीवरी पर मातृत्व लाभ नहीं : मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
12 March 2020 8:11 AM GMT
अगर पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं तो तीसरे बच्चे की दूसरी डिलीवरी पर मातृत्व लाभ नहीं : मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि केंद्रीय सिविल सर्विस नियम के तहत अगर किसी महिला कर्मचारी को पहली डिलीवरी में जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं तो उसे तीसरी तीसरे बच्चे की दूसरी डिलीवरी में मातृत्व लाभ नहीं मिलेगा। नियम के तहत मातृत्व का लाभ उन कर्मचारियों को मिलता है जिनके दो से कम बच्चे जीवित हैं।

न्यायमूर्ति एपी साही और न्यायमूर्ति सुब्रामणनियम प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की।

यह अपील केंद्र सरकार ने एकल पीठ के 18.06.2019 के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की है जिसमें तीसरे बच्चे की डिलीवरी पर भी मातृत्व का लाभ देने का आदेश दिया गया था। यह मामला केंद्रीय सिविल सेवा (छुट्टी) नियम 1972 के तहत आता है।

इसके नियम 43 में कहा गया है कि

"43(1) महिला सरकारी कर्मचारी (अप्रेंटिस सहित) जिसके दो कम बच्चे जीवित हैं, को उचित अधिकारी 180 दिनों का मैटर्निटी लीव इसकी शुरुआती दिनांक से दी जा सकती है।"

43(2) छुट्टी की इस अवधि के दौरान कर्मचारी को छुट्टी पर जाने से पहले मिल रहे वेतन के बराबर वेतन दिया जाएगा…।"

इस मामले में प्रतिवादी ने कहा कि दावा दूसरी डिलीवरी के लिए की जा रहा है, जिसकी वजह से तीसरे बच्चे की पैदाइश हुई है।

अदालत ने कहा,

"इस बारे में कोई विवाद नहीं है कि प्रतिवादी/रिट याचिकाकर्ता को छुट्टी देने से मना नहीं किया गया है बल्कि विवाद नियम 43 के तहत उस अवधि के वेतन को लेकर है जिसके तहत शर्तें पूरी होने तक भुगतान का प्रावधान नहीं है और इसका अर्थ यह हुआ कि इसका लाभ तभी दिया जाए जब दावेदार के दो से ज़्यादा जीवित बच्चे नहीं हों।"

प्रतिवादी के वक़ील ने कहा कि तीसरे बच्चे की दूसरी डिलीवरी को मातृत्व अवकाश लाभ देने के नियम का अपवाद माना जाए। फिर यह भी कहा गया कि वेतन सहित 180 दिन की छुट्टी का लाभ दिया जाए।

इस पर अदालत ने कहा,

"हमने पाया है कि दूसरी डिलीवरी से तीसरे बच्चे की पैदाइश हुई है…लाभ उसी स्थिति में मिलना है जब दावेदार को दूसरा बच्चा पैदा हुआ हो।"

"नियम साफ़ कहता है कि लाभ तभी मिल सकता है जब दावेदार को दो से ज़्यादा बच्चे नहीं हों।"

अदालत ने कहा कि इस फ़ैसले में एकल जज ने ग़लती से नियम को ध्यान में रखे बिना प्रतिवादी को लाभ दिए जाने का आदेश दे दिया।

अदालत ने कहा,

"जब जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं तो बच्चों की डिलीवरी एक के बाद एक होती है समय के अंतर के आधार पर उसकी उम्र और कौन बड़ा है और कौन छोटा यह निर्धारित होता है और इसे दो डिलीवरी माना जाता है।"

अदालत ने यह कहते हुए उस आदेश को ख़ारिज कर दिया और कहा,

"अपीलकर्ताओं को अपवाद की परिस्थिति में कोई भी ढील देने की सहूलियत उपलब्ध है और स्वाभाविक घटना के कारण अपवाद की स्थिति बनती है और उस स्थिति में मामले पर ग़ौर किया जा सकता है, क्योंकि मामला वित्तीय परिणामों का है और यह नवजात को उसके लाभ से वंचित कर देगा जिसका न तो नियमों को बनाए जाने से कोई मतलब है और न बच्चे पैदा करने की माता-पिता की इच्छा से।"

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