एनईईटी-पीजी: 'आप फिर से कैसे कह सकते हैं कि वो महिला है, जब याचिकाकर्ता खुद को ट्रांसजेंडर मानता है?' तेलंगाना हाईकोर्ट ने राज्य की खिंचाई की

  • एनईईटी-पीजी: आप फिर से कैसे कह सकते हैं कि वो महिला है, जब याचिकाकर्ता खुद को ट्रांसजेंडर मानता है? तेलंगाना हाईकोर्ट ने राज्य की खिंचाई की

    तेलंगाना हाईकोर्ट ने अदालत के पहले के निर्देश के बावजूद एनईईटी पीजी 2023 में 'थर्ड जेंडर' श्रेणी के तहत एक ट्रांसजेंडर डॉक्टर को पंजीकृत करने के लिए परामर्श प्राधिकरण को निर्देश नहीं देने के लिए राज्य सरकार की खिंचाई की है।

    पिछले महीने, उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि "नीट पीजी 2023 के लिए केंद्रीय कोटा या राज्य कोटा के तहत किसी भी कोर्स में उसके प्रवेश पर विचार करते समय याचिकाकर्ता को" अनुसूचित जाति "के उम्मीदवार के अलावा थर्ड जेंडर के दर्जे का लाभ भी दिया जाए, जो याचिकाकर्ता के लिए फायदेमंद हो।"

    20 जुलाई को फिर से शुरू हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस अभिनाद कुमार शाविली और जस्टिस एन. राजेश्वर राव की खंडपीठ ने कहा,

    "आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप फिर कैसे कह सकते हैं कि वह महिला है, जबकि वह खुद को एक ट्रांसजेंडर मानता है? पहले की रिट याचिका के बावजूद, जिसे 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निपटा दिया गया था, और इस न्यायालय द्वारा अंतरिम निर्देश देने के बावजूद, आप याचिकाकर्ता को फिर से एक महिला के रूप में कैसे वर्गीकृत कर सकते हैं?"

    याचिकाकर्ता डॉ. कोय्यला रूथ जॉन पॉल ने पहले राष्ट्रीय चिकित्सा समिति (एनएमसी) द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें इस आधार पर एनईईटी पीजी 2023 के 'थर्ड जेंडर' कोटा के तहत पंजीकरण और आरक्षण से वंचित कर दिया गया था कि पीजी मेडिकल शिक्षा विनियम, 2000, लिंग आधारित आरक्षण प्रदान नहीं करता है।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एल. रविचंदर ने दलील दी कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद, राज्य या केंद्र सरकार द्वारा एनईईटी पीजी चयन में 'तीसरे लिंग' के तहत आरक्षण बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

    अदालत को बताया गया कि कलोजी नारायण राव स्वास्थ्य एवं विज्ञान विश्वविद्यालय ने उसे फिर से 'महिला' श्रेणी के तहत पंजीकृत किया और उसे 'ट्रांसजेंडर' कोटा के तहत आरक्षण देने से भी इनकार कर दिया।

    पीठ ने कहा,

    “जब आप सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू कर रहे हैं, तो आप उस व्यक्ति को दो बार अदालत में क्यों दौड़ा रहे हैं? अगर इस तरह का रवैया रहा तो याचिकाकर्ता को कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ेंगे और NEET और उन सभी चीजों को भूल जाना पड़ेगा।''

    राज्य की ओर से पेश विशेष सरकारी वकील, अधिवक्ता संजीव कुमार ने प्रस्तुत किया कि हाल ही में राज्य ने विभिन्न क्षेत्रों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को "सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग" मानने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे और उनके कार्यान्वयन के संबंध में निर्देश प्राप्त करने के लिए समय का अनुरोध किया था।

    विशेष जीपी ने अदालत के आदेश के बारे में राज्य परामर्श प्राधिकरण के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से निर्देश देने का भी काम किया।

    पूरा मामला

    याचिकाकर्ता पीजी एनईईटी 2023 में उपस्थित हुई, और जब काउंसलिंग शुरू हुई, तो उसने देखा कि उसे 'तीसरे लिंग' श्रेणी के तहत पंजीकृत होने के बावजूद, 'महिला' श्रेणी में रखा गया था। इसके अलावा, उन्हें केवल 'शेड्यूल कास्ट' श्रेणी के तहत आरक्षण के लिए माना गया, न कि 'थर्ड जेंडर' श्रेणी के तहत।

    उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय चिकित्सा समिति (एनएमसी) ने आरक्षण नीति जारी की थी, लेकिन ट्रांसजेंडर कोटा शामिल करने में विफल रही। उन्होंने एनएएलएसए फैसले में निर्धारित दिशानिर्देशों पर भरोसा करते हुए 'थर्ड जेंडर' श्रेणी को शामिल करने के लिए कई अभ्यावेदन दिए, लेकिन उनमें से किसी पर भी विचार नहीं किया गया।

    असहाय महसूस करते हुए, याचिकाकर्ता ने जनवरी में पहली बार अपनी वकील सागरिका कोनेरू के माध्यम से अदालत का दरवाजा खटखटाया, और 'ट्रांसजेंडर' श्रेणी के बजाय 'महिला' श्रेणी के तहत अपने वर्गीकरण को चुनौती दी।

    अदालत ने एनएमसी को याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए अभ्यावेदन पर विचार करने का आदेश दिया और कहा कि एनएएलएसए फैसले में निर्धारित कानून के अनुसार उचित आदेश पारित किए जाएं। याचिकाकर्ता ने एनएमसी के समक्ष नया अभ्यावेदन दिया। हालांकि, एनएमसी ने कहा कि चूंकि पोस्ट ग्रेजुएशन मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2000 में लिंग के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है, इसलिए याचिकाकर्ता को 'थर्ड जेंडर' कोटा के तहत सीट नहीं दी जा सकती।

    नवीनतम रिट याचिका में एनएमसी द्वारा जारी आदेश को अदालत के समक्ष चुनौती दी जा रही है। यह राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में ट्रांसजेंडरों के लिए आरक्षण की भी मांग करता है।

    केस टाइटल: डॉ.कोयला रूथ जॉन पॉल बनाम भारत संघ

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