सुभाष चंद्रा की 6.25 करोड़ की लोन योजना पर NCLT की रोक, संपत्तियां ट्रांसफर करने पर भी पाबंदी
Amir Ahmad
1 Sept 2026 1:10 PM IST

राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) नई दिल्ली की नवगठित पांच सदस्यीय पीठ ने एस्सेल समूह के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा की लोन योजना की मंजूरी पर रोक लगाई। इस योजना के तहत कुल 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले लेनदारों को केवल 6.25 करोड़ रुपये दिए जाने थे।
पीठ ने सुभाष चंद्र को अपनी संपत्तियों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ट्रांसफर या निपटान करने से भी रोक दिया। लेनदारों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गारंटर की संपत्तियों को सुरक्षित रखने की मांग की थी।
इसके बाद पीठ ने आदेश दिया,
"हम यह भी निर्देश देते हैं कि गारंटर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपत्तियों का हस्तांतरण नहीं करेगा।"
पीठ ने मामले में संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए।
NCLT अध्यक्ष जस्टिस अनुपिंदर सिंह की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ में ज्यूडिशियल सदस्य बचू वेंकट बाला रा दास और महेंद्र खंडेलवाल तथा तकनीकी सदस्य अतुल चतुर्वेदी और रविंद्र चतुर्वेदी शामिल हैं।
मामला पांच सदस्यीय पीठ के समक्ष इसलिए पहुंचा, क्योंकि NCLT की मूल दो सदस्यीय पीठ इस बात पर एकमत नहीं हो सकी थी कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 के तहत प्रस्तावित ऋण चुकौती योजना को मंजूरी दी जा सकती है या नहीं और इसकी सीमा क्या होगी।
कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 419(5) के तहत मतभेद होने की स्थिति में मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजे जाने का प्रावधान है। मूल पीठ ने दर्ज किया कि तीसरे सदस्य के समक्ष मामला रखे जाने के बाद भी कोई बहुमत राय नहीं बन सकी।
सुभाष चंद्र की प्रस्तावित योजना में लेनदारों को 6.25 करोड़ रुपये और दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए 25 लाख रुपये देने का प्रस्ताव था। इसके मुकाबले स्वीकृत दावे 22,006.57 करोड़ रुपये के थे। यानी लेनदारों को उनके स्वीकृत दावों का बेहद छोटा हिस्सा मिलने वाला था और करीब 99.9 प्रतिशत की कटौती होती।
इसके बावजूद मतदान में 80.814 प्रतिशत मताधिकार रखने वाले लेनदारों ने योजना के पक्ष में मतदान किया।
मूल दो सदस्यीय पीठ में ज्यूडिशियल सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी शामिल थीं। दोनों ने अलग-अलग राय दी थी। जस्टिस भारद्वाज ने योजना को मंजूरी देने का समर्थन किया था और कहा कि इसके प्रभाव को उन लेनदारों तक सीमित रखा जा सकता है, जिन्होंने योजना के पक्ष में मतदान किया। वहीं तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी ने योजना को खारिज करने की राय दी थी।
इसके बाद मामले को तीसरे सदस्य ज्यूडिशियल सदस्य निलेश शर्मा के पास भेजा गया। 25 अगस्त के अपने आदेश में उन्होंने ऋण चुकौती योजना को मंजूरी देने के पक्ष में राय दी थी। उन्होंने माना था कि योजना के पक्ष में मतदान करने के लिए कानून में निर्धारित सीमा पूरी हो गई।
तीसरे सदस्य ने कहा था कि कुछ लेनदारों की आपत्ति या सुभाष चंद्र के वित्तीय लेनदेन से जुड़े सवाल अपने आप में योजना को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकते।
उन्होंने अनिल कुमार के माध्यम से 960 लोगों और सुनील जैन के माध्यम से 300 अन्य लोगों के दावों की भी जांच की। उनके अनुसार इन दावों को केवल सुभाष चंद्र की कथित मौखिक आश्वासन के आधार पर स्वीकार किया गया और किसी सहायक दस्तावेज के अभाव में इन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि तीसरे सदस्य ने माना कि इन अनियमितताओं से पूरी दिवाला प्रक्रिया अमान्य नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार ऋण चुकौती योजना को मंजूरी मिल जाने के बाद वह सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिसमें योजना के खिलाफ मतदान करने वाले लेनदार भी शामिल हैं।
मामला जब दो सदस्यीय मूल पीठ के समक्ष वापस आया तो उसने पाया कि तीसरे सदस्य ने दोनों मूल सदस्यों के बीच मौजूद विशिष्ट मतभेदों का समाधान करने के बजाय स्वतंत्र रूप से अपना आदेश पारित किया।
इससे मामले में गतिरोध की स्थिति बनी रही। इसी के बाद इसे नवगठित पांच सदस्यीय पीठ के समक्ष भेजा गया। अब पांच सदस्यीय पीठ ने ऋण चुकौती योजना की मंजूरी पर रोक लगाते हुए सुभाष चंद्र की संपत्तियों के हस्तांतरण पर भी रोक लगाई।


