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COVID -19 वॉरियर बन आपदा प्रबंधन का काम करें' मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कई मामलों में जमानत देते समय रखी शर्त

SPARSH UPADHYAY
19 May 2020 5:14 AM GMT
COVID -19 वॉरियर बन आपदा प्रबंधन का काम करें मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कई मामलों में जमानत देते समय रखी शर्त
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सोमवार (18-मई-2020) को लगभग 5 जमानत आवेदन एवं 2 अग्रिम जमानत आवेदन के मामलों में जेल में बंद/गिरफ्तारी के प्रति आशंकित आरोपियों/व्यक्तियों को इस शर्त पर जमानत दे दी कि वे संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष खुद को "COVID -19 वॉरियर्स" के रूप में पंजीकृत करेंगे। इसके पश्च्यात, उन्हें COVID -19 आपदा प्रबंधन का काम सौंपा जायेगा।

उल्लेखनीय है कि अदालत ने इन मामलों में याचिकाकर्ताओं की जमानत पर लगायी गयी इस शर्त को (COVID -19 वॉरियर के तौर पर कोरोना आपदा प्रबंधन सम्बन्धी कार्य करना), इन याचिकाकर्ताओं के मौलिक कर्तव्य [संविधान के अनुच्छेद 51-ए (डी/घ) के अंतर्गत आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करना] से जोड़ कर देखा।

न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने इन सभी जमानत आवेदनों में यह शर्त, याचिकाकर्ताओं की जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए लगायी।

अदालत के अपने आदेशों में विचार

दरअसल, यह मामले भारतीय दंड संहिता, 1860, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955, नारकोटिक्स ड्रग्स साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985, मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981, परीक्षा अधिनियम इत्यादि की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत दंडनीय अपराध से सम्बंधित थे।

जमानत आवेदन के एक मामले में [गोपाल पटेल बनाम मध्यप्रदेश राज्य MCRC-13626-2020], याचिकाकर्ता गोपाल पटेल, बीते 13-दिसम्बर-2019 से हिरासत में ही था और उसके खिलाफ आरोप पत्र (चार्जशीट) भी बहुत पहले ही दाखिल किया जा चुका था।

वहीँ अग्रिम जमानत आवेदन के एक मामले में [शिवकुमार शर्मा बनाम मध्यप्रदेश राज्य M.Cr.C. No.13606/2020], याचिकाकर्ता शिवकुमार शर्मा जोकि उचित मूल्य की दुकान का सेल्समैन था उसपर दिनांक 01/08/2019 से 31/03/2020 तक की अवधि के दौरान, कथित तौर पर आपराधिक न्यास भंग (Criminal breach of trust) का आरोप लगा है। याचिकाकर्ता ने क्राइम नंबर 62/2020 के मामले में स्वयं की गिरफ्तारी की आशंका जताई।

धारा 439 सीआरपीसी, 1973 के तहत दायर जमानत आवेदन के मामलों में, इस बात पर गौर करते हुए कि याचिकाकर्ताओं का लंबे समय तक 'ट्रायल के पूर्व निरोध' (pre-trial detention), स्वतंत्रता की अवधारणा के लिए खतरा है, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को जमानत का लाभ देने का आदेश दिया।

कोर्ट का आदेश: COVID -19 वॉरियर के रूप में करना होगा कार्य

कुछ मामलों में [इस बात को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता युवा है/मध्यम आयु वर्ग का है/ शारीरिक रूप से सक्षम नागरिक है] जमानत अर्जी/अग्रिम जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए अदालत ने अपने आदेश में इस बात का उल्लेख किया कि वर्तमान समय में जहां पूरी मानवता COVID -19 महामारी के खिलाफ जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीँ सरकारी तंत्र को आपदा प्रबंधन की प्रक्रिया में मदद/सहायता की अत्यधिक कमी का सामना करना पड़ रहा है।

अदालत ने इसी क्रम में अपने आदेश में देखा कि

"राष्ट्र के नागरिकों के रूप में याचिकाकर्ता (जमानत के लिए अदालत में आवेदन करने वाले व्यक्ति), अनुच्छेद 51-ए (डी/घ) के तहत अपने मौलिक कर्तव्य का निर्वहन करके ऐसे संकट के समय में सरकार की सहायता करने के लिए बाध्य हैं। तदनुसार, यह न्यायालय इसे जमानत दिए जाने की शर्तों में से एक बनाते हुए, उपयुक्त आदेश पारित करना उचित समझता है, ताकि याचिकाकर्ता के रूप में मानव संसाधन का उपयोग, समाज की भलाई के लिए एवं संकटों को दूर करने के लिए किया जा सके।"

गौरतलब है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 51-ए (डी/घ), आम नागरिक के मौलिक कर्त्तव्य की बात करता है, और यह कहता है कि

51A. मौलिक कर्तव्य. - भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह—

(a/क) XXXXXXXXXXXXXXX

(b/ख) XXXXXXXXXXXXXXX

(c/ग़) XXXXXXXXXXXXXXX

(d/घ) "देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे"

इन मामलों में, जमानत देते हुए आमतौर पर जिस प्रकार की शर्तें अदालत द्वारा रखी जाती हैं, वह भी इन जमानत अर्जियों को स्वीकार करते रखी ही गयीं, परन्तु इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं को COVID -19 वॉरियर के रूप में अपनी सेवाएं देने के लिए भी कहा गया।

अदालत ने इस सम्बन्ध में अपने आदेशों में यह देखा कि,

"याचिकाकर्ता को संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष/साथ अपना नाम, 'COVID-19 वॉरियर रजिस्टर' नामक एक रजिस्टर में दर्ज करते हुए खुद को 'COVID -19 वारियर्स' के रूप में पंजीकृत करना होगा। इसके बाद याचिकाकर्ता को, संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के विवेक पर, सभी निर्धारित सावधानियां बरतते हुए COVID -19 आपदा प्रबंधन का काम सौंपा जाएगा।"

अदालत ने आगे अपने आदेशों में यह भी कहा कि,

"सौंपे गए कार्य की प्रकृति, मात्रा और अवधि, संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के विवेक पर छोड़ दी जाती है। इस न्यायालय को यह उम्मीद है कि याचिकाकर्ता, संविधान के अनुच्छेद 51-ए (डी) के अनुसार, आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करने के अपने मौलिक कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए, संकट के इस समय में समाज की सेवा करने के अवसर पर खुद की योग्यता साबित करेगा।"

अंत में, अदालत ने इन आदेशों के सम्बन्ध में सम्बंधित जिलाधिकारी को, यदि इस शर्त का अनुपालन किसी भी याचिकाकर्ता द्वारा नहीं किया जाता है, तो इसकी सूचना अदालत को देने का आदेश भी दिया।

अदालत ने अपने आदेश में यह देखा कि,

"अनुपालन के लिए संबंधित जिला मजिस्ट्रेट को इस आदेश के पारित होने के बारे में सूचित करने के लिए रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है। संबंधित जिला मजिस्ट्रेट को ऐसा निर्देशित किया जाता है कि यदि इस शर्त का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो उस स्थिति में वे कोर्ट को इस विषय में सूचना देंगे और ऐसी किसी भी सूचना के प्राप्त होने पर, रजिस्ट्री को यह निर्देशित किया जाता है कि वे मामले को पीयूडी (PUD) के रूप में उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करेंगे।"

अंत में, हम न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ द्वारा दिनांक 18-मई-2020 को जमानत आवेदन को लेकर दिए गए समस्त आदेशों को यहाँ अटैच नहीं कर सकते हैं, लेकिन हम अपने पाठकों के लिए 2 मामलों में सुनाये गए अदालत के आदेश को यहाँ जोड़ रहे हैं। ये वही दो मामले में, जिनके बारे में हमने ऊपर संक्षेप में बात की है।

गोपाल पटेल बनाम मध्यप्रदेश राज्य MCRC-13626-2020

शिवकुमार शर्मा बनाम मध्यप्रदेश राज्य M.Cr.C. No.13606/2020







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