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केवल इसलिए कि पक्षकारों को कम अंतराल की तारीखें दी गयीं, अदालत पर दुर्भावना का आरोप नहीं लगाया जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

SPARSH UPADHYAY
8 Sep 2020 11:27 AM GMT
Writ Of Habeas Corpus Will Not Lie When Adoptive Mother Seeks Child
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मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर खंडपीठ) ने शुक्रवार (04 सितंबर) को यह फैसला सुनाया कि "केवल इसलिए कि पक्षकारों को कम अंतराल पर तारीखें दी जाती हैं, अदालत को किसी भी दुर्भावना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।"

न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल की एकल पीठ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) की धारा 24 के तहत दायर अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, जिसके अंतर्गत 'आरसीएसएचएम केस नंबर 153/2019' को (जिसमे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत मामला दायर किया गया था) सागर फैमिली कोर्ट से जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सागर के न्यायालय में ट्रान्सफर करने की प्रार्थना की गयी थी।

[नोट: सीपीसी की धारा 24 किसी भी पक्ष, या किसी भी पक्ष के आवेदन पर किसी भी स्तर पर अपील, या अन्य कार्यवाही के हस्तांतरण की सामान्य शक्ति से सम्बंधित है]

पार्टियों के काउन्सल द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्क

मामले के आवेदक के वकील द्वारा यह तर्क दिया गया कि जिस तरीके से फॅमिली न्यायालय मामले में आगे बढ़ रहा था, आवेदक को उक्त न्यायालय पर कोई विश्वास नहीं है।

उन्होंने आगे अनुरोध किया कि मामला या तो जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सागर या परिवार न्यायालय, दमोह के न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है।

फैमिली कोर्ट की ओर से कथित रूप से दुर्भावना को इंगित करने के लिए, आवेदक के वकील ने कहा कि 15.7.2019 को, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत दायर आवेदन पर फैमिली कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए गए थे।

मौजूदा आवेदक 08.08.2019 को फैमिली कोर्ट में पेश हुई। इसके बाद, फैमिली न्यायालय दिन-प्रतिदिन के आधार पर मामले में आगे बढ़ रहा है जो कि मनमाना है और आवेदक के हित के खिलाफ है।

वकील ने आगे आग्रह किया कि एक से अधिक वर्षों से फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित कई अन्य मामलों में फैमिली कोर्ट द्वारा ऐसी कोई रुचि नहीं दिखाई गई थी, लेकिन "तत्काल मामले में दिखाए गए अतिरिक्त-सामान्य हित, आवेदक के लिए हाईकोर्ट का रुख करने का कारण बन गए।"

विपक्षी पक्ष द्वारा यह तर्क दिया गया कि चूंकि अन्य मामलों में पार्टियों के पते सागर जिले से बाहर थे, इसलिए अदालत ने नोटिस की सेवा सुनिश्चित करने के लिए एक लंबी तारीख दी होगी, जबकि, तत्काल मामले में, दोनों पक्ष सागर में रहते हैं इसलिए अदालत द्वारा कम अंतराल की तारीखें दी जा रहीं हैं।

न्यायालय का अवलोकन

अदालत ने कहा कि पीठासीन अधिकारी न्यायिक समय का संरक्षक है और सुनवाई / कार्यवाही की तारीखों को तय करने के लिए उसके पास पूर्ण विवेक है। जब तक कि अदालत द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया, प्रथम दृष्टया किसी भी पक्ष के प्रति पक्षपात का कारण नहीं बनाती है, यह न्यायालय हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य नहीं है।

इसके अलावा, न्यायालय इस मामले में दी गई सुनवाई की तारीखों की अन्य मामलों के साथ तुलना करने के लिए इच्छुक नहीं था क्योंकि यह मामले में हस्तक्षेप करने के लिए एक आधार नहीं हो सकता जब तक कि कुछ और दिखाया नहीं जाता। ऐसा कुछ जो दर्शाता हो कि कम अंतराल की तारीखों को देने से पक्षकार के साथ अन्याय हुआ है।

अदालत ने आगे कहा,

"यह पक्षकार की पसंद पर नहीं छोड़ा जा सकता है कि उसकी बात कब सुनी जाए/ तय की जाए। बिना किसी सबूत के उसके पक्ष में आदेश न मिलने की आशंका, एक मामले के हस्तांतरण का आदेश देने के लिए एक आधार नहीं हो सकती है।"

पूर्वगामी विश्लेषण के मद्देनजर, कोर्ट ने मामले के हस्तांतरण का आदेश देने का कोई कारण नहीं पाया। निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह तत्काल वैवाहिक मामले को कानून के अनुसार सख्ती से सुने और तय करे। इस प्रकार आवेदन को खारिज कर दिया गया।

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