गुजरात कोर्ट ने नाबालिग बेटी से बलात्कार के लिए व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई

  • गुजरात कोर्ट ने नाबालिग बेटी से बलात्कार के लिए व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई

    गुजरात के मेहसाणा कोर्ट ने पिछले सप्ताह एक व्यक्ति को अपनी नाबालिग बेटी के साथ बार-बार बलात्कार करने और उसे गर्भवती करने तथा उसे और उसके परिवार के सदस्यों को जान से मारने की धमकी देने के लिए दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

    39 पन्नों के आदेश में स्पेशल जज (POCSO) सारंग एस. काले ने अपराध की भयावह प्रकृति पर गहरा सदमा व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के मामले को देखकर 'वास्तव में स्तब्ध' हैं।

    न्यायाधीश ने कहा कि जबकि अदालत ने POCSO Act के तहत कई मामलों को संभाला है, यह एक विशेष रूप से दुखद मामला था जहां आरोपी पीड़िता का पिता था।

    अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयान के दौरान उसे शांत करने और आत्मविश्वास बनाने में मदद करने के लिए कोमल बातचीत का इस्तेमाल किया गया।

    उसके बाद उसकी आँखों में आँसू भर आए क्योंकि उसने बार-बार यह अविश्वास व्यक्त किया कि उसके पिता ने उसका बलात्कार किया।

    न्यायालय ने कहा कि POCSO Act बनाते समय विधानमंडल के पास भी यह सोचने का कोई कारण नहीं था कि एक पिता अपनी ही बेटी से बलात्कार करने के लिए अधिनियम के तहत आरोपी हो सकता है।

    अपराध की गंभीरता पर जोर देते हुए आदेश में कहा गया,

    "यह न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि यह मामला जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। आरोपी ने अपनी बेटी के साथ बलात्कार किया। अगर ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति को समाज में रहने दिया जाए तो कोई भी लड़की या महिला सुरक्षित नहीं रह पाएगी। इसलिए आरोपी को अधिकतम सजा यानी आजीवन कारावास की सजा दी जानी चाहिए।"

    न्यायालय ने आगे कहा कि आरोपी ने मुकदमे के दौरान कोई पश्चाताप नहीं दिखाया जैसा कि उसके हाव-भाव से पता चलता है, जिसे न्यायालय ने विशेष रूप से देखा।

    न्यायाधीश ने कहा,

    "इस अदालत के पास इस आरोपी के जघन्य कृत्य के खिलाफ अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। एक तरफ आरोपी ने अपनी बेटी का यौन शोषण किया और दूसरी तरफ पीड़िता को धमकाया कि वह इस घटना के बारे में किसी को न बताए। अगर वह ऐसा करती है तो वह उसे उसके गृह नगर यानी उत्तर प्रदेश नहीं भेजेगा और उसकी मां भी मर जाएगी। इस प्रकार, आरोपी ने न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी पीड़िता का बलात्कार किया। यह आदमी वास्तव में एक अपराधी है।"

    एक सराहनीय टिप्पणी में अदालत ने अतिरिक्त लोक अभियोजक आरके जोशी के समर्पण की भी प्रशंसा की, जिन्होंने सर्जरी की आवश्यकता वाले ब्रेन ट्यूमर का पता चलने के बावजूद पूरी लगन से मुकदमे को आगे बढ़ाया।

    अदालत ने कहा कि उन्होंने बार-बार इस अदालत को बताया कि मुकदमे में अभियोजन पक्ष के साक्ष्य समाप्त होने के बाद ही वह सर्जरी करवाएंगी।

    संक्षेप में मामला

    12 अप्रैल, 2024 को देवीप्रसाद (पीड़िता का भाई) ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि पीड़िता को पेट में बहुत दर्द हो रहा था और मेडिकल जांच में पता चला कि वह गर्भवती है।

    पूछताछ करने पर पीड़िता ने बताया कि उसके पिता ने बार-बार उसके साथ बलात्कार किया और किसी को कुछ भी बताने पर उसे और परिवार के अन्य सदस्यों को जान से मारने की धमकी दी।

    जांच के बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(एफ)(जे)(एन), 354(ए), और 506(2) के साथ-साथ POCSO Act की धारा 4, 5(एल)(एन)(जे)(2), 6 और 8 के तहत आरोप पत्र दायर किया गया।

    मुकदमे के दौरान यह स्थापित किया गया कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी (17 वर्ष, 8 महीने और 25 दिन की)। अदालत ने उसकी गवाही को सुसंगत और विश्वसनीय पाया, जिसकी पुष्टि मेडिकल साक्ष्य से हुई।

    जज ने यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न और अन्य अपराधों के बारे में पीड़िता की एकमात्र गवाही ही आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है।

    अदालत ने यह भी कहा कि मुकदमे के दौरान बचाव पक्ष अभियोजन पक्ष के मामले को प्रभावी ढंग से चुनौती देने में विफल रहा न तो गवाहों से जिरह करके और न ही कोई बचाव साक्ष्य पेश करके।

    इसके परिणामस्वरूप अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी को उचित संदेह से परे दोषी साबित किया गया था और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

    फैसला सुनाने से पहले यह देखते हुए कि पीड़िता ने गंभीर शारीरिक और मनोवैज्ञानिक आघात सहा है।

    अदालत ने निर्देश दिया कि उसके पुनर्वास के लिए गुजरात पीड़ित मुआवजा कोष से उसे 5 लाख रुपये दिए जाएं।

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