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'केवल अपराध का परिमाण जमानत से इनकार का मानदंड नहीं हो सकता': दिल्ली हाईकोर्ट ने हैलो टैक्सी घोटाला मामले में आरोपियों को राहत दी

LiveLaw News Network
19 Jan 2022 12:01 PM GMT
केवल अपराध का परिमाण जमानत से इनकार का मानदंड नहीं हो सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने हैलो टैक्सी घोटाला मामले में आरोपियों को राहत दी
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दिल्ली हाईकोर्ट ने करोड़ों रुपये के घोटाले के दो आरोपियों को जमानत देते हुए हाल ही में कहा कि अपराध की भयावहता जमानत से इनकार करने का एकमात्र मानदंड नहीं हो सकता है।

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा,

"जमानत का उद्देश्य मुकदमे के समय आरोपी की उपस्थिति को सुरक्षित करना है; इस प्रकार, यह उद्देश्य न तो दंडात्मक है और न ही निवारक, और जिस व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया है उसे केवल तभी हिरासत में रखा जाना चाहिए जब विश्वास करने के कारण हों कि वे भाग सकते हैं या सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं या गवाहों को धमका सकत हैं।"

पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं ने भारतीय दंड संहिता की धारा 406, 420, 409 और 120बी के तहत आर्थिक अपराध शाखा पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध में नियमित जमानत की मांग की थी। आरोपी-याचिकाकर्ता इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और प्रमोटर हैं, जिन पर धोखाधड़ी का आरोप है। आरोप है कि उन्होंने निवेश पर एक साल के भीतर 200% रिटर्न का वादा किया था।

शिकायतकर्ता ने 9,00,000 रुपये का निवेश किया था, जबकि उसके दोस्तों ने भी प्रस्तावित निवेश योजना में कुछ राशि का निवेश किया था। हर महीने की 10 तारीख को निवेशकों को किश्त देने का वादा किया गया था। लेकिन पहले तीन महीने तक कोई किश्त नहीं मिली। पूछताछ करने पर निवेशकों को बताया गया कि कंपनी का खाता फ्रीज कर दिया गया है।

पैसा आज तक नहीं लौटा और आरोपी ने फोन उठाना बंद कर दिया।

याचिकाकर्ता आरोपी की अग्रिम जमानत लंबित होने के दरमियान ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे यह निष्फल हो गई। याचिकाकर्ता आरोपी दिसंबर 2020 से जेल में है।

निष्कर्ष

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने पर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता एक साल से हिरासत में हैं, जबकि आरोप पत्र और पूरक आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है। अदालत ने माना कि दोष परीक्षण का मामला है और इस स्तर पर फैसला नहीं किया जा सकता है।

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि जब किसी अभियुक्त द्वारा आपराधिक मुकदमे में न्याय दिलाने में हस्तक्षेप की कोई आशंका नहीं होती है तो न्यायालय को अभियुक्तों को उनकी स्वतंत्रता से वंचित करने पर विचार करते समय सतर्क रहना चाहिए। अदालत ने कहा कि एक मात्र अस्पष्ट धारणा के आधार पर कि आरोपी जांच को विफल कर सकता है, कारावास को लंबा नहीं किया जा सकता है।

मामले में संजय चंद्र बनाम सीबीआई, (2012) पर भरोसा किया गया।

कोर्ट ने कहा, " चार्जशीट के साथ-साथ पूरक चार्जशीट दायर की गई है, और उपलब्ध सभी सबूत दस्तावेजी प्रकृति के हैं और जांच एजेंसी की हिरासत में हैं।

धोखाधड़ी का पैसा याचिकाकर्ताओं को सौंपा गया या नहीं, यह ट्रायल का मामला है और इस पर विचार नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इस न्यायालय की राय है कि याचिकाकर्ताओं की निरंतर हिरासत की अब आवश्यकता नहीं है और दोनों याचिकाकर्ताओं को जमानत दी जानी चाहिए। "

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रदीप सिंह राणा, अंकित राणा, अभिषेक राणा और नीतीश पांडे पेश हुए। एपीपी अमित चड्ढा राज्य के लिए पेश हुए।

केस शीर्षक: सुरेंद्र सिंह भाटी बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) और अन्य जुड़े मामले

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