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सीआरपीसी की धारा 125 के तहत जारी आदेश की समीक्षा कर सकता है मजिस्ट्रेट, धारा 362 का प्रतिबंध लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
21 Feb 2020 5:42 AM GMT
सीआरपीसी की धारा 125 के तहत जारी आदेश की समीक्षा कर सकता है मजिस्ट्रेट, धारा 362 का प्रतिबंध लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट
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“धारा 125 के तहत मुकदमे में धारा 362 के प्रावधान को गौण रखा जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत दोनों पक्षों के बीच विवाद के निपटारे के लिए आदेश जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को अपना आदेश वापस लेने या निरस्त करने का अधिकार है, बशर्ते संबंधित आदेश की शर्तों का उल्लंघन हो रहा हो। सीआरपीसी की धारा 362 का प्रतिबंध इस आदेश पर लागू नहीं होता।

कानून

सीआरपीसी की धारा प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह किसी व्यक्ति को उसके सामर्थ्य के हिसाब से अपनी पत्नी, बच्चों एवं माता-पिता के लिए मासिक भत्ते के भुगतान का निर्देश दे सकता है।

दूसरी ओर, सीआरपीसी की धारा 362 के तहत संबंधित जज को किसी लिपिकीय या अंकगणितीय गलती को छोड़कर अपने फैसले या अंतिम आदेश को बदलने या उसकी समीक्षा करने का अधिकार नहीं है।

मुद्दा

सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अर्जी का निपटारा करते हुए जारी किये गये आदेश को निरस्त किया जाना और परिणामस्वरूप अर्जी को फिर से अस्तित्व में लाना सीआरपीसी की धारा 362 के विपरीत है।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी की खंडपीठ ने सीआरपीसी की धारा 362 लाने के पीछे विधायिका की मंशा पर विचार किया तथा इस धारा का विश्लेषण किया।

ए. बचाव उपबंध

बेंच ने कहा कि जैसा कि धारा के तहत बचाव उपबंध हैं, सीआरपीसी की धारा 362 के तहत किये गये सख्त प्रावधान निम्नलिखित दो शर्तों के तहत गौण हो जाते हैं:

i. दंड प्रक्रिया संहिता द्वारा अन्य प्रकार से बचाव

ii. कोई अन्य कानून जो कुछ समय के लिए लागू हुआ हो

इसलिए, बेंच ने कहा,

"विधायिक इस बात से अवगत थी कि ऐसी स्थितियां हैं या हो सकती हैं जहां खुद दंड प्रक्रिया संहिता या कुछ समय के लिए लागू किसी अन्य कानून के तहत आपराधिक मुकदमों से संबंधित फैसले में बदलाव करने या उसकी समीक्षा करने पर विचार किया जा सकता है।"

सीआरपीसी में ही उपलब्ध अपवादों की जांच करते हुए बेंच ने सीआरपीसी की धारा 125 की विधायी योजना का पता लगाया :

"सीआरपीसी की धारा 125 एक सामाजिक न्याय कानून है, जो पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के लिए गुजारा का आदेश देता है। पत्नियों, बच्चों और माता-पिता का रखरखाव एक निरंतर दायित्व है।"

'बादशाह बनाम उर्मिला बादशाह गोडसे (2014) 1 एससीसी 188' का मामला उपरोक्त बयान के समर्थन में लिया गया था। यह मामला धारा 125 की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की अनुमति देता है, क्योंकि इसका उद्देश्य भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित सामाजिक न्याय की संवैधानिक दृष्टि हासिल करना है, इसलिए, सामाजिक न्याय के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अदालत के कंधों पर एक कर्तव्य सौंपा गया है और इसलिए, किसी कानून की व्याख्या के दौरान, कानून और समाज के बीच की खाई को पाटने के मसले को भी ध्यान में रखना होता है।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने के क्रम में महज 'प्रतिकूल दृष्टिकोण' अपनाने के बजाय सामाजिक न्याय के निर्धारण/सामाजिक संदर्भ के निर्णय का दृष्टिकाण अपनाया जाना चाहिए।

प्रो. माधव मेनन ने कहा है,

"यह दृष्टिकोण कोर्ट के समक्ष आने वाले वैसे बहुसंख्य मामलों में अनिवार्य तौर पर संसद और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित समानता के न्यायशास्त्र के प्रभावी इस्तेमाल के लिए है, जहां असमर्थ पक्ष प्रतिकूल मुकदमे में फंसते हें और कोर्ट को समान न्याय के लिए याद किया जाता है।"

प्रो. मेनन के अनुसार, सामाजिक आर्थिक असमानताओं की स्थितियों प्रतिकूल दृष्टिकोण अपेक्षाकृत कमजोर पक्ष की ओर नुकसानदेह तरीके से कार्य करता है। इसलिए यह जज का दायित्व है कि वह ऐसी असमानताओं को लेकर संवेदनशील हो, ताकि न्याय का गला न घोंटा जा सके।

बी. सीआरपीसी की धारा 125(एक), धारा 125(5) और 127 के तहत आदेश में बदलाव या आदेश को निरस्त करने संबंधी प्रावधान

खंडपीठ ने कहा, "सीआरपीसी की धारा 125 पर गहराई से विचार करने से यह संकेत मिलता है कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मुकदमे में फैसला सुनाने या अंतिम आदेश जारी करने के बाद कोर्ट अधिकारविहीन नहीं हो जाता। इसमें धारा 125(1), 125(5) और 127 के तौर पर खुद ही सभी अभिव्यक्त प्रावधान मौजूद हैं।"

धारा 125 में वर्णित अभिव्यक्ति "जैसा कि मजिस्ट्रेट समय-समय पर निर्देश देता है" का इस्तेमाल समय आने पर मजिस्ट्रेट के सतत अधिकार क्षेत्र की व्याख्या के लिए किया जाता है तथा मजिस्ट्रेट धारा 125 के तहत आदेश जारी करने के बाद अधिकारविहीन नहीं हो जाता।

जहां धारा 125(5) कुछ शर्तें पूरी होने पर धारा 125(1) के तहत जारी आदेश को निरस्त करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को देती है, वहीं धारा 127 विधायी इरादा प्रकट करती है, जिसके अंतर्गत मजिस्ट्रेट को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत जारी आदेश बदलने का अधिकार प्राप्त है।

व्यवस्था

1. धारा 125 के तहत मुकदमें में धारा 362 के प्रतिबंधात्मक प्रावधान को गौण रखा जा सकता है।

उपरोक्त दलीलों के आधार पर बेंच ने व्यवस्था दी कि धारा 362 के तहत निषेधात्मक प्रावधान सीआरपीसी की धारा 125 के अंतर्गत दायर मुकदमों में गौण रहता है। अपीलकर्ता के वकील ने केवल इसी मुद्दे पर दलीलें दी थी बेंच ने उसे अस्वीकार कर दिया।

2. धारा 125 की व्याख्या महिलाओं को न्याय दिलाने के स्रोत के रूप में की जानी चाहिए।

बेंच ने यह भी कहा, "सीआरपीसी की धारा 125 की व्याख्या उन महिलाओं को न्याय के स्रोत के रूप में की जानी चाहिए, जिनके कल्याण के लिए ये प्रावधान किये गये हैं।"

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