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मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड के ट्रायल में शामिल वॉलियंटर्स पर हुए साइड इफेक्ट के आरोप पर SII, DCGI, ICMR नोटिस जारी किया

LiveLaw News Network
19 Feb 2021 10:53 AM GMT
मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड के ट्रायल में शामिल वॉलियंटर्स पर हुए साइड इफेक्ट के आरोप पर SII, DCGI, ICMR नोटिस जारी किया
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मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) द्वारा उत्पादित ऑक्सफोर्ड/एस्ट्रा ज़ेनेका वैक्सीन 'कोविशील्ड' के क्लिनल ट्रायल में शामिल एक वॉलियंटर द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है। अपनी याचिका में वॉलियंटर ने वैक्सीन की पहली खुराक लेने के बाद कथित रूप से गंभीर प्रभाव पड़ने का आरोप लगाया है।

वॉलियंटर की इस याचिका पर हाईकोर्ट ने भारत सरकार के स्वास्थ्य सचिव के माध्यम से भारत सरकार को नोटिस जारी किया। इसी तरह ड्रग्स कंट्रोलर जनरल, ICMR के महानिदेशक, सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ, एस्ट्रा ज़ेनका यूके के सीईओ और एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष को नोटिस जारी किया गया है।

मामले की अगली सुनवाई 26 मार्च को होगी।

याचिकाकर्ता आसिफ़ रियाज़ का आरोप है कि वह एक गंभीर साइट इफेक्ट से जूझ रहा है। इसके चलते वह 11 अक्टूबर 2020 से 26 अक्टूबर 2020 तक अस्पताल में भर्ती रहा था। यह इफेक्ट नई वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल नियम, 2019 के नियम 41 के उप-नियम (ए) के सपठित नियम 2 (एफएफ) के तहत "गंभीर प्रतिकूल घटना (एसएई)" के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

यह कहते हुए कि एसएआई की स्थिति एसआईआई द्वारा बनाई गई वैक्सीन के ट्रायल के परिणामस्वरूप हुई। इस वैक्सीन को लेकर याचिकाकर्ता ने यह घोषणा किए जाने की मांग करता है कि यह वैक्सीन सुरक्षित नहीं है और वह उसके और उसके परिवार को हुए कष्टों और आघात के लिए (मेडिकल और कानूनी लागत) एसआईआई को उसे क्षतिपूर्ति के तौर पर 5 करोड़ रूपये दिए जाने निर्देश देने की मांग की है।

याचिका में प्रतिदिन के ट्रायल की प्रक्रिया को दर्शाया गया है। इसमें चार चरण शामिल हैं और इस ट्रायल के चरण 1 का उद्देश्य नई दवा का मनुष्यों पर परीक्षण और उसकी सहनशीलता का अनुमान लगाना है। उसने स्वेच्छा से COVID-19 के इलाज खोजने के लिए हो रहे प्रयासों को हिस्सा बनने का फैसला किया था।

यह भी कहा गया है कि याचिकाकर्ता को प्रदान की गई प्रतिभागी सूचना पत्र से पता चलता है कि वैक्सीन सुरक्षित था और यदि कोई साइट इफेक्ट होगा तो वह बहुत मामूली होगा।

अपनी याचिका में याचिकाकर्ता ने कहा,

"मैं प्रस्तुत करता हूं कि मुझे पार्टिसिपेशन इंफॉर्मेशन शीट में वैक्सीन की सुरक्षा के बारे में विश्वास दिलाया गया था। इसलिए मैंने वैक्सीन लेने के लिए वॉलियंटर बनने का फैसला किया।"

यह वैक्सीन 1 और 11 अक्टूबर 2020 को याचिकाकर्ता को दिया गया था। 26 अक्टूबर को अस्पताल से छुट्टी मिल जाने के बाद याचिकाकर्ता को एक डिस्चार्ज लेटर दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि वह "एक्यूट न्यूरो एनसेफैलोपैथी" से पीड़ित था, जो एक एसएई की परिभाषा के तहत आता है।

एसएई के कारण याचिकाकर्ता का दावा है कि वह न केवल विभिन्न न्यूरोलॉजिकल मुद्दों जैसे कि हाथ कांपना, बेचैनी आदि से पीड़ित रहना आदि बीमारियों से जूझता रहा। बल्कि साथ ही उसे काम-काज में भी नुकसान उठाना पड़ा है।

उपरोक्त विवरण के आधार पर याचिका प्रस्तुत करती है कि हितधारक उस साइड इफेक्ट को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं, जो वैक्सीन ने याचिकाकर्ता पर डाले हैं "अनैतिक और अवैज्ञानिक रूप से इसे एकतरफा रूप से छुपाने की कोशिश कर रहे हैं।"

याचिका में कहा गया है,

"उक्त वैक्सीन अध्ययन से अभी तक कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकला है, जिससे स्पष्ट रूप से कहा जा सके कि वैक्सीन बिल्कुल सुरक्षित है... मैं उत्सुक हूं कि कोई भी दर्द से न गुजरे। हालांकि मुझे और मेरे परिवार को इससे पीड़ा पहुँची है। इसलिए, मुझे लगता है कि कोई भी कदम उठाएं। व्यावसायिक रूप से उक्त वैक्सीन का निर्माण रोका जाए और इसे आम जनता को वितरित न किया जाए, क्योंकि यह सुरक्षित वैक्सीन पूरी तरह से बेईमानी है और डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों और 2019 के नियमों द्वारा निर्धारित सुरक्षा मानदंड के खिलाफ जाती है।"

यह कहते हुए कि एक ट्रायल वालंटियर सार्वजनिक रूप से अपने जीवन के लिए जान जोखिम में डालता है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत संरक्षण का हकदार है, याचिका में यह प्रार्थना भी की गई है कि यह घोषणा की जाए कि यह वैक्सीन असुरक्षित है और मुआवजे के तौर पर याचिकाकर्ता को 5 करोड़ रूपये क्षतिपूर्ति के रूप में दिए जाए।

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