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सार्वजनिक भूमि पर कब्जे के मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान ‌लिया

LiveLaw News Network
13 Feb 2020 11:44 AM GMT
सार्वजनिक भूमि पर कब्जे के मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान ‌लिया

सार्वजनिक भूमि के अतिक्रमण के मुद्दे पर मद्रास हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान ‌लिया है। जस्टिस एन किरुबाकरन और जस्टिस आर पोंगिअप्पन की खंडपीठ ने टिप्‍पणी की कि निजी पार्टिंया, राजनीतिक प्रभाव, धन बल और बाहुबल के जर‌िए और सरकारी अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर सरकारी भूमि पर कब्जा कर रही हैं।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी संपत्ति विवाद के एक मामले की सुनवाई में की है। मामले में याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि विचाराधीन भूमि का सरकारी है और जिला न्यायालय के समक्ष विवाद का विषय है।

याचिकाकर्ता ने बताया उस मुकदमे में मूल वादी ने जमीन को निजी संपत्ति बताया था और उस पर निर्माण की अनुमति मांगी। सरकार ने शुरुआत में उस मुकदमे का विरोध किया..बाद में वह कार्यवाही से हट गई, क्योंकि उसने लिखित बयान दायर नहीं किया था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह मामला वादी और सरकारी अधिकारियों के बीच मिलीभगत का संकेत देता है, ताकि निजी फायदे के लिए सरकार को जमीन के मामले में धोखा दिया जा सके।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट बताया कि संबंधित अदालत ने एकपक्षीय साक्ष्य दर्ज करने के बाद मामले में फैसला सुरक्षित रखा था।

हाईकोर्ट इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए उक्त मामले में आगे की सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर फैसला सुनाने की अनुमति दी जाती है, तो सरकार की मूल्यवान संपत्ति पर पर कब्जा हो जाएगा।

कोर्ट ने कहा-

"हालांकि यह कोर्ट संपत्त‌ि के स्वामित्व से संबंधित विवाद के मुद्दे में जाने की इच्छुक नहीं है, तथ्य प्रकट करते हैं कि सरकारी वकील का आचरण संदिग्ध है। ऐसा लगता है कि उसने छठे प्रतिवादी के साथ मिलीभगत की है, जिसके चलते लिखित बयान दर्ज नहीं किया गया। इसलिए, अगले आदेश तक सभी अग्रिम कार्यवाहियों पर अंतरिम स्‍थगन रहेगा।"

कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला बानगी भर है। जमीनों का मूल्य बढ़ गया है, इसलिए सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए भूमि संरक्षण जरूरी है। इसलिए, सुओ मोटो में तमिलनाडु सरकार को पक्ष के रूप में माना जाता है और उन्हें तीन सप्ताह के भीतर निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर देने का निर्देश दिया जाता है:

1) कितने एकड़ सरकारी/पोराम्बोक भूमि उपलब्ध हैं?

2) जिन संपत्तियों पर अतिक्रमण किया गया है, उनकी सीमा क्या है?

3)उन संपत्तियों को पुनः प्राप्त करने के लिए कितनी कार्यवाहियां शुरू की गईं?

4) सरकारी/ पोराम्‍बोक भूमि के अतिक्रमण या अवैध कब्जे के संबंध में विभिन्न न्यायालयों में कितनी कार्यवाहियां लंबित हैं और कार्यवाहियां किन चरणों में हैं?

5) तमिलनाडु में विभिन्न न्यायालयों में सरकारी वकीलों द्वारा कितने मामलों में बचाव नहीं किया गया है?

6) सार्वजनिक/सरकारी/ पोराम्बोक संपत्तियों की रक्षा के मामलों का बचाव नहीं करने के मामलों में सरकारी वकीलों और अधिकारियों खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है?

7) अतिक्रमित हो चुकी सार्वजनिक/सरकारी/ पोराम्‍बोक संपत्तियों की पहचान करने, उन्हें पुनः प्राप्त करने और उपलब्ध संपत्तियों की रक्षा करने के लिए सरकार एक अलग विंग क्यों नहीं बनाती है?

8) क्यों नहीं सरकार वेबसाइट में सार्वजनिक/ सरकारी/ पोराम्‍बोक संपत्तियों का विवरण वेबसाइट अपलोड करती है, ताकि संपत्तियों की जानकारी सभी को रहे।

9) क्या सरकार ने उप-पंजीयकों को ऐसी संपत्तियों के संबंध में किसी भी दस्तावेज को पंजीकृत करने से रोकने के लिए संबंधित जिला पंजीकरण कार्यालय को सार्वजनिक/ सरकारी/ पोराम्बोक संपत्तियों का विवरण दिया है?

10) यदि ऐसा नहीं है, तो सरकार संबंधित जिले के पंजीकरण कार्यालय को सार्वजनिक/ सरकारी/पोराम्‍बोक संपत्तियों का विवरण क्यों नहीं देती है?

मामले का विवरण:

केस टाइटल: एसवी सुब्बैया बनाम बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु व अन्य।

केस नं .: WP No 2816/2020

कोरम: जस्टिस एन किरुबाकरन और ज‌स्टिस आर पोंगिअप्पन

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