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विदेशी अदालत के फ़ैसले को लागू करने की समय सीमा वह होगी जो इसे लागू करने वाले देश ने तय किया है : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
20 March 2020 7:45 AM GMT
विदेशी अदालत के फ़ैसले को लागू करने की समय सीमा वह होगी जो इसे लागू करने वाले देश ने तय किया है : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी विदेशी अदालत के फ़ैसले को भारत में लागू करने की समय सीमा वही होगी जो संबंधित दूसरे देश ने तय किया है।

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि समय सीमा की शुरुआत उस समस्य से होती है जब आदेश किसी विदेशी अदालत में पास हुआ। हालाँकि, अगर फ़ैसला धारक संबंधित देश में इस फ़ैसले को लागू करने के लिए क़दम उठता है और इसे संतोषप्रद ढंग से लागू नहीं किया जाता है तब वह भारत में इस फ़ैसले को लागू करवाने के लिए तीन साल के भीतर याचिका दायर कर सकता है।

इस मामले में अपील बैंक ऑफ़ बड़ोदा ने दायर किया था।

अदालत ने कहा कि परिसीमन अधिनियम में इस बात का ज़िक्र नहीं है कि विदेशी अदालत के फ़ैसले को दूसरे संबंधित देश में कब तक लागू किया जाएगा। एजी ने कहा कि इस मामले में कार्रवाई तभी हो सकती है जब इसे लागू कराने की अपील सीपीसी की धारा 44A के अधीन दायर की जाती है। इसमें कहा गया है कि विदेशी अदालत में किए गए फ़ैसले को भारतीय फ़ैसला माना जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि अगर हम केके वेणुगोपाल की इस दलील को मान लें कि समय सीमा वह होगी जिस दिन फ़ैसले की प्रमाणित प्रति सौंपी गई तो इसके बहुत ही बेतुके परिणाम होंगे। वर्तमान मामले का अगर उदाहरण लें, तो यूके में किसी फ़ैसले को लागू करने की समय सीमा 6 साल होगी।

हालाँकि, भारत में यह 12 साल है। जिस दिन आदेश पास होता है उसी दिन से यह लागू होने योग्य हो जाता है और इसलिए अगर इस पर जिस देश में इसे लागू होना है उस देश का क़ानून लागू होना है तो इसकी सीमा 6 साल होगी और अगर फ़ोरम देश का क़ानून लागू होगा तो 12 साल होगी। जो दलील दी गई है उसके अनुसार फ़ैसला धारक 100 साल तक चुप रह सकता है और इसके बाद वह फ़ैसले की प्रमाणित प्रति पेश करेगा कि क़ानून को लागू किया जाए।

यह दोनों ही देशों में क़ानूनी प्रक्रिया का मज़ाक़ बनाना होगा। समय सीमा को फ़ैसला धारक की इच्छा पर 100 वर्षों तक स्थगित नहीं रखा जा सकता। इसलिए, हम इस दलील को ख़ारिज करते हैं"।

अदालत ने कहा कि धारा 44A ज़िला अदालत को सिर्फ़ फ़ैसले को लागू करने का अधिकार देता है। वह यह नहीं बताता कि फ़ैसले को लागू करने की समय सीमा क्या है।

अनुच्छेद 136 का मतलब सिर्फ़ भारतीय अदालतों के फ़ैसले से है। हम अनुच्छेद 39 का संदर्भ दे सकते हैं क्योंकि इसका संबंध अनादरित विदेशी बिल्ज़ से है। अनुच्छेद 101 का संबंध किसी विदेशी फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर मामले से है।

विधायिका का मंतव्य यह रहा होगा कि अनुच्छेद 136 का मतलब सिर्फ़ भारतीय अदालतों के फ़ैसले से होगा। और इसमें कहा गया है कि फ़ैसला या आदेश दीवानी अदालत का होना चाहिए।

भारत के दीवानी अदालत का अधिकारक्षेत्र विदेशी अदालतों की तरह नहीं है । फिर, नया परिसीमन अधिनियम 1963 में बना और क़ानून निर्माता सीपेसी की धारा 44A से वाक़िफ़ थे।

पूरी दुनिया में इस समय यह विचार व्यक्त किया जाता है कि किसी देश में क़ानून की सीमा दूसरे देश में लागू होना चाहिए। जिन मामलों में उपचार की संभावना उस देश में समात कर दी गई है जहाँ इसे लागू होना है, तो इससे फ़ैसला धारक व्यक्ति के फ़ैसला को लागू कराए जाने के अधिकार को समाप्त कर देता है और यह वैसे ही अधिकार का निर्माण करता है। ये बड़े अधिकार हैं और इन्हें सिर्फ़ प्रक्रियात्मक नहीं कहा जा सकता। भारत की वैश्विक मौजूदगी बढ़ रही है और वह ऐसा देश नहीं बने रह सकता जहाँ क़ानून को पूरी तरह प्रक्रियात्मक माना जाए।

अदालत ने कहा कि कोई पक्ष जो विदेशी फ़ैसले को लागू कराने के लिए अगर आवेदन देता है तो उसे ऐसा आदेश 21 क्लाज़ 11 के तहत करना चाहिए। इस तरह के आवेदन के बिना अदालत आदेश को लागू नहीं कर सकता।

अगर कोई फ़ैसला धारक निर्धारित समय सीमा के भीतर फ़ैसले को उस देश में लागू करने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया जहाँ इसे लागू किया जाना है, तो उस स्थिति में उसने उस देश में इस फ़ैसले को लागू करने का अधिकार खो दिया है जहाँ कार्रवाई का कारण पैदा हुआ। यह न्याय का मज़ाक़ उड़ाना होगा कि कोई व्यक्ति उस देश में फ़ैसले को लागू कराने का अपना अधिकार खो दिया है जिस देश में उसे लागू किया जाना है और उसे फ़ोरम देश में इसे लागू करने की अनुमति मिलती है।यह हमारे इस सिद्धांत के ख़िलाफ़ होगा जिसके तहत हमने यह माना है कि समय सीमा का क़ानून सिर्फ़ प्रक्रियात्मक क़ानून नहीं है।

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