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केरल भारतीय क्षेत्र में, इसकी अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसले मानने के लिए बाध्य, चर्च मामले में हाईकोर्ट का फैसला रद्द

LiveLaw News Network
17 Sep 2019 10:00 AM GMT
केरल भारतीय क्षेत्र में, इसकी अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसले मानने के लिए बाध्य, चर्च मामले में हाईकोर्ट का फैसला रद्द
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सुप्रीम कोर्ट ने केरल में चर्चों में प्रशासन और प्रार्थनाओं के संचालन के अधिकार को लेकर वर्ष 2017 के अपने फैसले में दो गुटों के विवाद में केरलहाई कोर्ट द्वारा छेड़छाड़ करने पर अपने फैसले में यह दोहराया है कि भविष्य में न्यायालयों द्वारा सुप्रीम कोर्ट आदेशों और निर्णयों के उल्लंघन को 'गंभीरता से' लिया जाएगा।

केरल हाई कोर्ट का आदेश किया गया था रद्द

शीर्ष अदालत ने केरल हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि मालनकारा चर्चों में प्रार्थना सेवाओं का मालाकार चर्च के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों द्वारा वैकल्पिक रूप से प्रशासन किया जाएगा।

दरअसल जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एम. आर. शाह की पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश के बारे में पता चलने के बाद जमकर फटकार लगाई थी और कहा, "यह एक बहुत ही आपत्तिजनक आदेश है। यह न्यायाधीश कौन हैं? उच्च न्यायालय को हमारे फैसले के साथ छेड़छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है। यह न्यायिक अनुशासनहीनता की ऊंचाई है। केरल में न्यायाधीशों को बताएं कि वे भारत का हिस्सा हैं। "

मामले की पृष्ठभूमि

दरअसल सुप्रीम कोर्ट, केरल उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ सेंट मेरीज ऑर्थोडॉक्स चर्च और अन्य द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें राज्य के वकील की उन दलीलों के आधार पर इस मुद्दे पर 2 रिट याचिकाओं पर सुनवाई बंद कर दी गई थी कि गुटों के बीच विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए उनके द्वारा कदम उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने यह दावा किया है कि मामले में उच्च न्यायालय द्वारा पारित कुछ निर्देश सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विपरीत थे। सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च और अन्य ने उच्च न्यायालय में 2 याचिकाएं दायर की थीं जिनमें मामले में पारित किए गए शीर्ष अदालत के आदेशों को लागू करने और वहां के चर्चों में प्रार्थना की सुरक्षा के लिए पुलिस सुरक्षा की मांग की गई थी।

दरअसल अपने वर्ष 2017 के फैसले में शीर्ष अदालत ने यह माना था कि वर्ष 1934 के मालनकारा चर्च के दिशानिर्देश के अनुसार मालनकारा चर्च के तहत 1,100 परगने और उनके चर्चों को रूढ़िवादी गुट द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।

"केरल उच्च न्यायालय का आदेश है न्यायिक अनुशासनहीनता"

केरल उच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश को रद्द करते हुए पीठ ने कहा :

"यह इस बात पर निर्भर करता है कि न्यायाधीश ने किस तरह से यह अंतरिम आदेश पारित किया है जो के. एस. वर्गीज बनाम सेंट पीटर्स एंड सेंट पॉल सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च व अन्य (2017) 15 SCC 333 में इस कोर्ट के फैसले के विपरीत है। इस अदालत ने इस आशय के कई निर्णय और आदेश पारित किए हैं कि किसी भी अदालत द्वारा इस तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस न्यायालय द्वारा एक सूट में निर्णय दिया गया है जो सभी (व्यक्तियों/पक्षकारों/हितधारकों) के लिए बाध्यकारी है और यह सभी का संवैधानिक कर्तव्य है कि इस न्यायालय के निर्णय और आदेश का पालन करें।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार, इस न्यायालय द्वारा घोषित कानून सभी न्यायालयों के लिए बाध्यकारी है और अनुच्छेद 144 के तहत, भारत के क्षेत्र के भीतर नागरिक और न्यायिक प्राधिकरण सर्वोच्च न्यायालय की सहायता से कार्य करेंगे। केरल भारत क्षेत्र के अनुसार सभी संबंधित कार्य करने के लिए बाध्य है।"

केरल के सभी न्यायालयों पर अपने निर्णय के. एस. वर्गीज के खिलाफ आदेश जारी करने पर प्रतिबंध लगाते हुए पीठ ने कहा :

उच्च न्यायालय ने इस न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों और आदेशों का उल्लंघन करते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया है। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस गलत आदेश को पारित करते समय किस तरह का न्यायिक अनुशासन दिखाई देता है जिसे बिल्कुल पारित नहीं किया जाना चाहिए था। हम केरल राज्य के सभी दीवानी न्यायालयों और उच्च न्यायालय को रोकते हैं कि के. एस. वर्गीज में इस अदालत के फैसले के जनादेश का उल्लंघन करते हुए कोई आदेश पारित नहीं करें। न्यायालयों द्वारा उल्लंघन को गंभीरता से देखा जा सकता है।

आदेश को रद्द करते हुए बेंच ने आगे कहा :

उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित मुकदमे से अपील आती है तो इस न्यायालय द्वारा पारित के. एस. वर्गीज निर्णय के संदर्भ के रूप में मुद्दे पर आगे मुकदमेबाजी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती है। उच्च न्यायालय को इस न्यायालय द्वारा पारित निर्णय और आदेश के साथ छेड़छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है और ये बाध्यकारी हैं तथा न्यायिक स्वामित्व को हर कीमत पर बनाए रखा जाना है।

इस मामले में आगे मुकदमेबाजी की कोई गुंजाइश नहीं है। हम न्यायालयों को उक्त निर्णय के बाद सभी लंबित मामलों को तय करने का निर्देश देते हैं। यह सभी संबंधितों को और अधिक स्पष्ट किया जाता है, ताकि न्यायालयों द्वारा भविष्य में निर्णय और आदेश के उल्लंघन को गंभीरता से देखा जा सके। इसी तरह के मामले जो लंबित हैं, उन पर निर्णय और आदेश का पालन किया जाना चाहिए। मामले में आगे मुकदमेबाजी नहीं हो सकती क्योंकि प्रतिनिधि सूट में निर्णय बाध्यकारी है।

पीठ ने केरल उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को 3 महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है कि विभिन्न अदालतों में चर्च विवाद के रूप में कितने मुकदमे लंबित हैं।



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