विभागीय जांच लंबित होने पर पदोन्नति रोके जाने के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचे सिविल जज
Amir Ahmad
18 May 2026 5:18 PM IST

हरियाणा में तैनात सिविल जज (जूनियर डिवीजन)-सह-न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पदोन्नति नहीं दिए जाने के खिलाफ पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। जज ने आरोप लगाया कि अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर उनकी पदोन्नति केवल प्रारंभिक स्तर पर लंबित विभागीय जांच के आधार पर रोकी गई जो मनमाना फैसला है।
याचिका में 21 अप्रैल, 2025 को फुल कोर्ट द्वारा लिए गए फैसले और 14 जुलाई, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके जरिए गैर-पदोन्नति के खिलाफ उनकी आपत्ति खारिज की गई।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने की। अदालत ने सीनियर एडवोकेट राजीव आत्मा राम को न्याय मित्र नियुक्त करते हुए मामले की अगली सुनवाई 22 मई तय की।
याचिका में कहा गया कि अप्रैल 2025 और अगस्त 2025 में जिन अधिकारियों को पदोन्नत किया गया, उनमें कई अधिकारी याचिकाकर्ता से कनिष्ठ थे। इसके बावजूद उन्हें केवल सतर्कता/विभागीय समिति के समक्ष लंबित शिकायत के आधार पर पदोन्नति से वंचित कर दिया गया।
जज का कहना है कि उनके खिलाफ अभी तक न तो आरोपपत्र जारी हुआ है और न ही किसी औपचारिक जांच की शुरुआत हुई। ऐसे में केवल प्रारंभिक स्तर पर लंबित शिकायत को पदोन्नति रोकने का आधार बनाना कानूनन सही नहीं है।
याचिका में दावा किया गया कि पदोन्नति के लिए हाईकोर्ट द्वारा तय सभी मानकों को याचिकाकर्ता पूरा करते हैं। उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में संबंधित अवधि के लिए बी प्लस (अच्छा) ग्रेडिंग दी गई। साथ ही सेवा रिकॉर्ड में कभी भी ईमानदारी संदिग्ध जैसी कोई टिप्पणी दर्ज नहीं की गई।
याचिकाकर्ता ने कहा कि वर्ष 2022-23 की गोपनीय रिपोर्ट में केवल इतना उल्लेख है कि उनके खिलाफ एक शिकायत विभागीय समिति के समक्ष विचाराधीन है।
याचिका में कहा गया कि संबंधित गोपनीय रिपोर्ट अभी अंतिम रूप नहीं ले पाई थी और सक्षम प्राधिकारी ने भी विभागीय कार्यवाही पूरी होने के बाद ही उस टिप्पणी के खिलाफ अभ्यावेदन देने की अनुमति दी थी। ऐसे में अधूरी या संभावित टिप्पणी को पदोन्नति रोकने का आधार बनाना सेवा कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि किसी शिकायत या प्रारंभिक स्तर की विभागीय कार्यवाही लंबित होने मात्र से पदोन्नति रोकने का कोई नियम या कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है। अधिकतम यह कदम तभी उठाया जा सकता है जब औपचारिक जांच शुरू करने का निर्णय लिया जा चुका हो।
याचिका में यह शिकायत भी की गई कि बार-बार अनुरोध के बावजूद उन्हें चीफ जस्टिस के समक्ष व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। इसे निष्पक्षता के सिद्धांतों और न्यायिक अधिकारियों को प्रशासनिक प्राधिकारियों तक पहुंच देने संबंधी न्यायिक फैसलों के विपरीत बताया गया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया कि पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और बाहरी कारणों के आधार पर इससे वंचित करना मनमानी है।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने फुल कोर्ट के 21 अप्रैल 2025 के फैसले और उनकी आपत्ति खारिज करने वाला आदेश रद्द करने की मांग की। साथ ही कानून के अनुसार अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) पद पर पदोन्नति के लिए उनके मामले पर विचार करने का निर्देश देने की भी मांग की गई।

