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तेलंगाना हाईकोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता को 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी

LiveLaw News Network
20 Oct 2021 9:59 AM GMT
तेलंगाना हाईकोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता को 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी
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तेलंगाना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा कि भ्रूण या अजन्मे बच्चे के जीवन को मां के जीवन से अधिक ऊंचे स्थान पर नहीं रखा जा सकता है।

न्यायमूर्ति बी विजयसेन रेड्डी ने कहा,

"गरिमा, स्वाभिमान, स्वस्थ जीवन (मानसिक या शारीरिक) आदि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के पहलू हैं, जिसमें एक महिला को गर्भावस्था का चुनाव करने और गर्भावस्था को समाप्त करने का अधिकार भी शामिल है। अगर गर्भावस्था बलात्कार या यौन शोषण के कारण होती है तो यह कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है।"

पृष्ठभूमि

अदालत 16 वर्षीय नाबालिग पीड़िता द्वारा अपने माता-पिता के माध्यम से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 (एमटीपी एक्ट) 2021 में संशोधन के प्रावधानों के अनुसार मेडिकल टर्मिनेशन की अनुमति मांगने वाली एक याचिका पर फैसला सुना रही थी। चिकित्सा मूल्यांकन ने निष्कर्ष निकाला है कि पीड़िता के साथ बलात्कार किया गया है और वह 26-27 सप्ताह की गर्भवती है।

पीड़िता की ओर से पेश अधिवक्ता सरव्या कट्टा ने तर्क दिया कि एक महिला को गर्भावस्था का चुनाव करने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक पहलू है जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित है।

उन्होंने आगे कहा कि एक महिला का अपने शरीर पर स्व-शासन होता है और इसके तहत गर्भावस्था का चुनाव करने और गर्भावस्था को समाप्त करने का अधिकार भी शामिल है।

यह भी तर्क दिया गया कि 24 सप्ताह से अधिक की गर्भवती महिला को कानूनी स्थगन के अधीन करना अमानवीय है क्योंकि बलात्कार पीड़िता के जीवन के अधिकार गर्भ में बल रहे बच्चे के जीवन के अधिकार से अधिक है।

कोर्ट का अवलोकन

कोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की अनुमति नहीं दी जाती है तो उसके गंभीर शारीरिक और मानसिक तनाव से गुजरने की पूरी संभावना है, जिसका उसके भविष्य के स्वास्थ्य और संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा,

"याचिकाकर्ता की उम्र 16 साल है और वह जिस मानसिक तनाव से गुजर रही है, उसे लेकर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता बच्चे के जन्म तक गर्भधारण करने में सक्षम होगी। याचिकाकर्ता और भ्रूण या पैदा होने वाले बच्चे के लिए भी चिकित्सा संबंधी जटिलताएं हो सकती हैं।"

याचिकाकर्ता के माता-पिता ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि वह गर्भावस्था को जारी रखने की स्थिति में नहीं है और गंभीर शारीरिक और मानसिक तनाव के कारण उसकी जान को खतरा है, जिसका उसे प्रतिदिन सामना करना पड़ रहा है।

कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भी विचार किया, जिसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए फिट है, लेकिन रक्तस्राव जैसी कुछ चिकित्सीय जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं और याचिकाकर्ता को सर्जिकल प्रक्रिया के अधीन किया जा सकता है, जिसके लिए एनेस्थीसिया की आवश्यकता होती है।

यह आगे देखा गया कि यद्यपि एमटीपी (संशोधन) अधिनियम 2021 के तहत 24 सप्ताह से अधिक के गर्भ को समाप्त करने के लिए प्रतिबंध मौजूद है। यह स्थापित कानून है कि संवैधानिक न्यायालयों को गर्भ को सीधे समाप्त करने का अधिकार है, भले ही गर्भ 24 सप्ताह से अधिक गया हो।

अदालत ने आगे टिप्पणी की,

"अगर याचिकाकर्ता को बलात्कार के कारण गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा। एक महिला को गर्भावस्था का विकल्प चुनने का अधिकार है। इसके साथ ही गर्भ को समाप्त करने का अधिकार अधिनियम 2021 के प्रावधानों के तहत शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन है।"

अदालत ने संबंधित अस्पताल को सभी उचित सावधानी बरतने और नाबालिग रेप पीड़िता के गर्भ को समाप्त करने का निर्देश दिया।

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