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कर्ता की ग़ैर-मौजूदगी में परिवार का कोई भी सदस्य मामले को अंजाम दे सकता है : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
20 Jan 2020 4:22 PM GMT
कर्ता की ग़ैर-मौजूदगी में परिवार का कोई भी सदस्य मामले को अंजाम दे सकता है : बॉम्बे हाईकोर्ट
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एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसी मामले में कर्ता की नियुक्ति नहीं हुई है तो हिंदू अविभाजित परिवार का कोई भी सदस्य किसी परिसर से किरायेदार को हटाने के मामले में सह-स्वामी के रूप में परिवार का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

न्यायमूर्ति एनजे जमादार ने स्पष्ट किया कि हिंदू अविभाजित परिवार का कोई सदस्य इस कार्य को अंजाम दे इसके लिए दो बातें ज़रूरी हैं। परिवार के सभी अन्य सदस्यों को इस पर कोई आपत्ति नहीं हो; और प्रतिनिधि सदस्यों को यह साबित करना होगा कि कर्ता अनुपस्थित है।

यह कहा गया कि अगर किसी अविभाजित परिवार में कर्ता था, तो परिसंपत्ति के सह-स्वामियों के अलावा उसको इमप्लीड करना होगा।

अदालत ने कहा,

"यह कहना और बात है कि कर्ता की अनुपस्थिति में परिवार के किसी अन्य सदस्य को विशेष परिस्थिति में मामले में शरीक होने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन मामला उस स्थिति में भिन्न होगा जब यह दावा किया जाता है कि कर्ता की नियुक्ति के बावजूद अगर विशेष परिस्थिति नहीं है तो उसे इस मामले में प्रतिनिधित्व करने को नहीं कहा जाएगा। बाद की परिस्थिति में कर्ता की अनुपस्थिति में मामले की प्रासंगिकता एक मुद्दा होगा।"

वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता ने पुनरीक्षण अदालत के एक फ़ैसले को चुनौती दी है। इसमें उसने हिंदू अविभाजित परिवार द्वारा दायर मामले में परिसंपत्ति से हटाए जाने को लेकर दायर मामले की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है।

याचिकाकर्ता ने इस मामले में त्रिभोवनदास हरिभाई तंबोली बनाम गुजरात राजस्व अधिकरण एवं अन्य(1991) 3 SCC 442 मामले में आए फ़ैसले का हवाला दिया है और कहा है कि संयुक्त परिवार की सम्पत्तियों के प्रबंधन में कर्ता सभी बराबर अधिकार वाले सदस्यों में प्रमुख है।

उसने दलील दी है कि यह मामला सीपीसी के नियम 10 का उल्लंघन करता है जिसमें कहा गया है कि यह क़ानूनी बाध्यता है कि हिंदू अविभाजित परिवार की ओर से दायर किसी मामले को कर्ता ही आगे बढ़ा सकता है।

"अपने चरित्र और क़ानूनी दृष्टि से, हिंदू अविभाजित परिवार का एक अलग महत्व है। हिंदू अविभाजित परिवार का प्रतिनिधित्व कर्ता करेगा, यह नियम है। निर्विवाद रूप से, उचित मामले में परिवार का वरिष्ठतम व्यक्ति भी कर्ता की भूमिका में आ सकता है अपर इस बारे में तथ्यात्मक सबूत पेश करने होंगे," उन्होंने कहा।

प्रतिवादी ने इस बात का प्रतिवाद किया और कहा कि परिवार का सह-स्वामी भी किराए पर लगायी गई परिसंपत्ति पर क़ब्ज़ा वापस लेने के लिए मामले को आगे बढ़ा सकता है।

यह कहा अगया कि कोई सह-स्वामी किसी अन्य सह-स्वामियों की अनापत्ति से मामले में किरायेदार से परिसंपत्ति को वापस लेने के लिए मामले का प्रतिनिधित्व कर सकता है। जब कोई सह-स्वामी किसी किरायेदार को संपत्ति से बेदख़ल करे के लिए कोई मामला दर्ज करता है तो यह मामला उस व्यक्ति की ओर से निजी तौर पर दायर माना जाता है और सह-स्वामियों के एजेंट के रूप में भी।

हाईकोर्ट ने उपरोक्त दलील को माना पर उसने यह भी कहा कि अगर कर्ता की नियुक्ति की गई है तो उसे इस मामले में पक्षकार बनाया जाना चाहिए।

"…मामले की प्रासंगिकता की जाँच करना सही होगा क्योंकि उत्तराधिकारी कर्ता को इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है," अदालत ने कहा।

याचिकाकर्ता की दलील पर ग़ौर करते हुए अदालत ने कर्ता को इस मामले में शामिल करने का निर्देश जारी किया और अगर ऐसा नहीं किया जाता है तब हिंदू अविभाजित परिवार द्वारा दायर मामले की प्रासंगिकता पर ग़ौर किया जाएगा।

अगर विपरीत बातों का पता चालता है तो अदालत के लिए यह उचित होगा कि वह हिंदू अविभाजित परिवार को अपना पक्ष रखने का मौक़ा देगा कि वह इस मामले को आगे बढ़ाना चाहता है या नहीं।


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