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शोध अक्षमता और दिवालिया कोड पर सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले (Insolvency & Bankruptcy Code)

LiveLaw News Network
27 Oct 2019 6:25 AM GMT
शोध अक्षमता और दिवालिया कोड पर सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले (Insolvency & Bankruptcy Code)
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शोध अक्षमता और दिवालिया कोड क़ानून (Insolvency & Bankruptcy Code) 2016 में आया और नवंबर-दिसंबर 2016 से यह लागू हो गया। इस क़ानून का उद्देश्य निगमित व्यक्तियों, पार्टनरशिप फर्मों और निजी व्यक्तियों के फर्मों के पुनर्गठन या उनको दिवालिया घोषित किये जाने की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से करने का था ताकि इस तरह के व्यक्तियों की परिसंपत्तियों का महत्तम मूल्यांकन हो सके उद्देश्य था। इन्सोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ़ इंडिया के गठन और सरकार के बकाये का के भुगतान को वरीयता दी जा सके।

कोड के कुछ बिन्दुओं के बारे में स्पष्टता को लेकर इसका मामला 2017 में ही अदालत पहुंच गया। कोड से जुड़े विभिन्न प्रावधानों की व्याख्या को लेकर अधिकतर पीठ की अध्यक्षता न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन ने की। इस आलेख में इस अधिनियम से जुड़े 10 महत्त्वपूर्ण मामलों का जिक्र किया जा रहा है जिन पर 2017 में फैसले आये।

सुप्रीम कोर्ट के 10 अहम फैसले इस तरह से हैं-

1. स्विस रिबंस प्रायवेट लिमिटेड और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य

सुप्रीम कोर्ट ने इस विधेयक की संवैधानिकता पर अपनी मुहर लगा दी। इस क़ानून की संवैधानिकता पर अपनी मुहर लगाते हुए न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन और नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा, "पैसे नहीं चुकानेवालों के दिन लद गए और अर्थव्यवस्था को उसकी उचित स्थिति बहाल कर दी गई है।"

2. पायोनीयर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और अन्य बनाम भारत संघ

सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 200 रियल्टरों की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए आईबीसी कोड में 2018 में जो संशोधन किया गया था उसे सही बताया जिसमें घर खरीदनेवालों को वित्तीय कर्ज देनेवाला माना गया था। यह फैसला न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस सूर्यकान्त की पीठ ने दिया और कहा की इन संशोधनों से संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) का उल्लंघन नहीं हुआ है।

पीठ ने कहा कि ये संशोधन मनमाना, तर्कहीन, जरूरत से अधिक और गैर-आनुपातिक भी नहीं हैं. पीठ ने कहा कि रेरा को संशोधन के अनुरूप कोड के साथ सामंजस्य बैठकर देखा जाए। फ्लैट खरीदनेवालों को जो राहत दी गई है वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षण पाने वाले लोगों के लिए ही है।

3.. बीके एजुकेशनल सर्विसेस प्रायवेट लिमिटेड बनाम पराग गुप्ता एंड एसोसिएट्स

इस मामले में फैसला सितम्बर 2018 में आया और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शुरू से ही परिसीमन अधिनियम आईबीसी की धारा 7 और 9 के तहत दायर होने वाले आवेदनों पर लागू होते हैं। न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा, "जब कोई डिफाल्ट करता है तो उसके खिलाफ मुकदमा दायर करने का अधिकार पैदा होता है। अगर यह डिफाल्ट आवेदन देने की तिथि से तीन साल पहले से हुआ है तो इस तरह के आवेदनों पर परिसीमन अधिनियम के अनुच्छेद 137 के तहत रोक होगा। ऐसा सिर्फ उसी मामले में नहीं होगा जिसमें मामलों के तथ्यों को देखते हुए दायर करने में हुई देरी को नजरअंदाज करने के लिए परिसीमन अधिनियम की धारा 5 लागू हो सकता है।

4. मैक्यूरी बैंक लिमिटेड बनाम शिल्पी कैबल टैकनोलॉजीस लिमिटेड

अदालत ने यह भी कहा कि कोड की धारा 9(3)(c) के प्रावधान इन्सोल्वेंसी की कार्यवाही शुरू करने के लिए जरूरी नहीं हैं। अदालत ने कहा कि धारा 9 के तहत दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद इसके तहत दायर होने वाले आवेदन को खारिज करना होगा क्योंकि धारा 9(3)(c) के तहत जरूरी प्रमाणपत्रों की प्रति नहीं होती।

5. जेके जूट मिल मज़दूर मोर्चा बनाम जुग्गीलाल कमलापत जूट मिल्स कंपनी लिमिटेड

यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण फैसला था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजीकृत कर्मचारी संघ अपने सदस्यों की ओर से एक ऑपरेशनल क्रेडिटर के रूप में याचिका दायर कर सकता है। न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और विनीत सरन की पीठ ने राष्ट्रीय कंम्पनी क़ानून अपीली अधिकरण (एनसीएलएटी) के एक आदेश के खिलाफ अपील स्वीकार की। इस आदेश में ट्रिब्यूनल ने कहा था कि कर्मचारी संघ ऑपरेशनल क्रेडिटर नहीं हो सकता है क्योंकि संघ कॉर्पोरेट ऋणधारकों को कोई सेवा नहीं देता।

यह कहा गया कि कर्मचारी संघ को कर्मचारी संघ अधिनियम के तहत स्थापित किया जाता है और इसलिए यह कोड की धारा 3(23) के तहत 'व्यक्ति' की परिभाषा के तहत आता है।

6. स्टैट बैंक ऑफ इंडिया बनाम रामा कृष्णन

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईबीसी कोड की धारा 14 जिसके तहत सीमित अवधि के लिए रोक का प्रावधान है, इन्सोल्वेंसी अपील को स्वीकार करने पर यह कॉर्पोरेट ऋणधारकों के निजी गारंटरों पर लागू नहीं होगा। न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पीठ ने यह भी कहा कि कोड की धारा 14(3), जिसमें यह कहा गया है कि धारा 14 की उपधारा (1) कॉर्पोरेट ऋणधारक के लिए गारंटी के करार की जमानत पर लागू नहीं होगा, पिछले प्रभाव से लागू होगा।

7. इनोवेंटिव इनडस्ट्रीज़ लिमिटेड बनाम आईसीआईसीआई बैंक और अन्य

इस मामले में डिफाल्टर अपीलकर्ता ने कहा कि उसके खिलाफ कोई भी राशि कानूनी तौर पर बकाया नहीं है क्योंकि महाराष्ट्र रिलीफ अंडरटेकिंग्स (स्पेशल प्रोविजन्स एक्ट), 1958 के तहत हर तरह की देनदारी को एक और साल के लिए निलंबित कर दिया गया है। यह भी कहा गया कि डिफाल्टर कंपनी कॉर्पोरेट ऋण पुनर्संरचना से गुजर रही है और इसके बावजूद कि इसके लिए एक करार किया गया है, पुनर्संरचना समझौते के अनुरूप राशि जारी नहीं की गई है।

8. मोबीलोक्स इनोवेशन प्रायवेट लिमिटेड बनाम किरुसा सॉफ्टवेयर प्रायवेट लिमिटेड

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को सुलझा दिया कि ऑपरेशनल ऋणदाताओं की और से जब कॉर्पोरेट इन्सोल्वेंसी प्रक्रिया (सीआईआरपी) को शुरू कराने के लिए आवेदन दायर किया जाता है तो उस सन्दर्भ में इस बात को कैसे तय करेंगे कि इस मामले में विवाद है। यह कैसे मानेंगे। इस मामले पर यह फैसला इससे पहले इनोवेंटिव इनडस्ट्रीज़ लिमिटेड बनाम आईसीआईसीआई बैंक और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद आया।

9. अर्सेलोरमित्तल इंडिया प्रायवेट लिमिटेड बनाम सतीश कुमार गुप्ता

इस वाद में अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और इंदु मल्होत्रा की पीठ ने आईबीसी कोड की धारा 29A(c) की व्याख्या की और कहा कि इन्सोल्वेंसी प्रस्ताव की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए निर्धारित समय सीमा, जिसकी चर्चा धारा 12 में की गई है, वह आवश्यक है और इसे 270 दिनों से आगे नहीं बढाया जा सकता है।

10. शशिधर बनाम इंडियन ओवरसीज़ बैंक

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनसीएलटी को कमिटी ऑफ़ क्रेडिटर्स (सीओसी) के वाणिज्यिक निर्णयों का मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं और ऐसा करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता कि वह भिन्न मत रखनेवाले ऋणदाताओं के प्रस्ताव संबंधी योजना को खारिज करने के औचित्य की जांच करे। यह फैसला न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और अजय रस्तोगी की पीठ ने सुनाया।

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