जीवन और स्वतंत्रता के प्रतिकूल: गुलफिशा फातिमा मामले में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की दलीलें

Amir Ahmad

13 Jan 2026 4:28 PM IST

  • जीवन और स्वतंत्रता के प्रतिकूल: गुलफिशा फातिमा मामले में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की दलीलें

    नया वर्ष उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के लिए शुभ संकेत लेकर नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) मामले में दिए गए 142 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में इन दोनों आरोपियों को जमानत देने से एक बार फिर इनकार कर दिया। इसके विपरीत अदालत ने सह-आरोपी अन्य पाँच व्यक्तियों को यह कहते हुए जमानत दे दी कि उनकी भूमिका गंभीर प्रकृति की नहीं थी। निर्णय में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक तर्कों पर तो विचार किया गया, किंतु वह दृष्टिकोण अत्यंत सीमित और निराशाजनक प्रतीत होता है। निस्संदेह यह फैसला दूरगामी प्रभाव वाला और चिंताजनक है।

    संक्षेप में तथ्य यह हैं कि यह मामला सात विशेष अनुमति याचिकाओं का समूह था जो दिल्ली हाइकोर्ट के उस आदेश से उत्पन्न हुआ था जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में सातों आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इन सभी पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा की साजिश में शामिल होने का आरोप है जिसमें 53 लोगों की जान चली गई थी।

    वर्ष 2020 में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पांच वर्ष बीत चुके हैं और वर्ष 2025 में देश की सुप्रीम कोर्ट उनके जमानत के प्रश्न पर विचार कर रही है। इस बीच स्थिति यह है कि मुकदमे की सुनवाई अभी तक प्रारंभ भी नहीं हुई है, क्योंकि मामला अब भी आरोप तय करने के चरण पर ही अटका हुआ है। पांच वर्ष का यह लंबा समय केवल एक आँकड़ा नहीं है बल्कि यह उस अवधि का प्रतीक है जिसमें संविधान की आत्मा मानो स्थगित कर दी गई हो। यह अवधि आरोपियों के जीवन और स्वतंत्रता के लिए अभिशाप के समान है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने न तो जांच एजेंसियों की निष्क्रियता पर सवाल उठाया और न ही निचली अदालतों द्वारा मुकदमे में हुई असाधारण देरी के लिए कोई जवाबदेही तय की।

    अदालत के समक्ष मुख्य आधार गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम 1976 की धारा 43डी(5) रहा। हैरानी की बात यह है कि न्यायालय ने इस प्रावधान की व्याख्या ऐसे की मानो यह संविधान के मूल सिद्धांतों विशेषकर अनुच्छेद 21, से पूर्णतः अपवाद हो। धारा 43डी(5) के अनुसार, यदि अदालत केस डायरी और आरोपपत्र के अवलोकन के बाद यह मान ले कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो जमानत नहीं दी जा सकती। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जमानत की सुनवाई में अभियुक्त की भूमिका आखिर क्या रह जाती है, जब अभियोजन और अदालत पहले ही सब कुछ तय कर लेते हैं। यह दृष्टिकोण भारतीय विधि व्यवस्था की प्रतिपक्षीय प्रणाली के विपरीत प्रतीत होता है।

    एक और विरोधाभास यह है कि यदि अभियुक्त यह सिद्ध करने में सफल हो जाए कि उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता और उसे जमानत मिल जाए तो बाद में उसी मामले में आरोप कैसे तय किए जाएंगे। आरोप तय करने के चरण पर अतिरिक्त साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किए जा सकते। व्यावहारिक रूप से, इसी कारण ऐसे मामलों में अदालतें जमानत देने से बचती हैं। धन शोधन निवारण कानून के मामलों में लागू तथाकथित 'दोहरी शर्तों' के तहत जमानत व्यवस्था भी इसी तरह की स्थिति उत्पन्न करती है।

    इस प्रकार, धारा 43डी(5) का उपयोग अनुच्छेद 21 के तहत स्थापित दशकों की न्यायिक परंपरा जिसमें निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई का अधिकार शामिल है को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए था। यद्यपि इस तर्क को स्वीकार करना कठिन है लेकिन वर्तमान मामले में यही वास्तविकता दिखाई देती है।

    जमानत से इनकार करने का एक और आधार यह बताया गया कि गवाहों की संख्या बहुत अधिक है और उनके बयान दर्ज करने में पर्याप्त समय लगेगा। यह तर्क भी असंतोषजनक है। पांच वर्षों में एक विधि छात्र अपनी संपूर्ण विधि शिक्षा पूरी कर सकता है, किंतु न्याय प्रणाली के लिए इतने समय में गवाहों की जांच भी संभव नहीं है यह तर्क सहज रूप से स्वीकार्य नहीं है।

    यह सब उस समय हो रहा है जब आपराधिक मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए दिन-प्रतिदिन सुनवाई की अवधारणा विकसित हो रही है। नई दंड प्रक्रिया संहिता में मुकदमे के दो वर्षों में निपटारे का प्रावधान किया गया है, यद्यपि उचित कारणों से समय बढ़ाने का विकल्प भी रखा गया है। यह संहिता वर्ष 2023 में लागू हुई थी। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि मुकदमा अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ, बल्कि यह है कि मुकदमा प्रारंभ तक क्यों नहीं हुआ।

    इससे भी अधिक निराशाजनक यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने न तो मुकदमे को शीघ्र प्रारंभ करने का कोई निर्देश दिया और न ही कोई समय-सीमा तय की। इसके बजाय, आरोपियों को यह कहकर एक और वर्ष की न्यायिक हिरासत में रखा गया कि वे अगले वर्ष पुनः जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। व्यवहार मे इसका अर्थ यह है कि जब भी वे जमानत के लिए आवेदन करेंगे अभियोजन के पास विरोध करने का एक और आधार मौजूद रहेगा।

    देरी के लिए अदालत ने आरोपियों को ही जिम्मेदार ठहराया। यह तर्क गंभीर चिंता का विषय है। किसी भी अभियुक्त को यह अधिकार होता है कि वह आरोपमुक्ति के लिए आवेदन करे पुनर्विचार याचिका दाखिल करे या अन्य अंतरिम आवेदन प्रस्तुत करे ताकि मुकदमा उसके हितों के प्रतिकूल न चले। निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार केवल शीघ्रता तक सीमित नहीं है बल्कि उसमें आपत्तियां उठाने और उन्हें सुने जाने का अधिकार भी शामिल है।

    यह भी उल्लेखनीय है कि ये दोनों आरोपी प्रारंभिक आरोपपत्र में नामित नहीं थे। उन्हें 2020 में संज्ञान लिए जाने के बाद पूरक आरोपपत्र के माध्यम से जोड़ा गया। वर्ष 2023 तक तीन और पूरक आरोपपत्र दाखिल किए गए और आरोपियों की संख्या लगातार बढ़ती रही। 2020 में दाखिल अधूरा आरोपपत्र केवल अनिवार्य जमानत से बचने का एक प्रयास प्रतीत होता है। पूरक आरोपपत्रों के दुरुपयोग की समस्या को पहले ही न्यायिक रूप से पहचाना जा चुका है किंतु इस पहलू पर भी सुप्रीम कोर्ट ने विचार नहीं किया।

    यदि इस निर्णय को भविष्य में घृणास्पद भाषणों को रोकने के उद्देश्य से देखा जाए तो शायद इसे सफल कहा जा सकता है। किंतु यह फैसला लंबे समय तक आलोचना का विषय रहेगा न केवल इसलिए कि इसने वर्तमान में जीवन और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों को सीमित किया है, बल्कि इसलिए भी कि भविष्य में ऐसे मामलों में जहां नागरिक अवज्ञा के उद्देश्य से दिए गए भाषणों को हिंसक घटनाओं से जोड़ दिया जाता है यह निर्णय एक खतरनाक मिसाल बन सकता है। सद्भावना से दिया गया भाषण स्वतः अपराध नहीं बन जाना चाहिए, किंतु इस निर्णय में दृष्टिकोण इसके विपरीत प्रतीत होता है।

    लेखक: आदित्य कृष्णा गुप्त। लॉ स्टूडेंट, यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज़, एलपीयू। विचार व्यक्तिगत हैं।

    Next Story