गुजरात हाईकोर्ट ने अंतरजातीय जोड़े को सुरक्षा दी; कानून हाथ में लेने के खिलाफ परिवार वालों और खाप पंचायतों को सावधान किया

  • गुजरात हाईकोर्ट ने अंतरजातीय जोड़े को सुरक्षा दी; कानून हाथ में लेने के खिलाफ परिवार वालों और खाप पंचायतों को सावधान किया

    गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अंतरजातीय जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के कानून अपने हाथ में लेने के किसी भी प्रयास से पुलिस सख्ती से निपटेगी।

    जस्टिस मौना भट्ट की खंडपीठ ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि अपने परिवार द्वारा कस्टडी में रखी गई महिला अपने परिवार की कड़ी प्रतिक्रियाओं से डर गई है। इसके परिणामस्वरूप एक हलफनामा दायर किया। इसमें दावा किया गया कि उसका आवेदक-पति ने धोखे से अपहरण कर लिया है और वह अपनी गरिमा और सम्मान को बनाए रखने के लिए अपने परिवार के साथ रहना चाहती है। हालांकि, अदालत के समक्ष दिया उसका बयान हलफनामे में कही गई बातों से पूरी तरह अलग है।

    अदालत ने कहा कि वह डरी हुई है और परिवार की कड़ी प्रतिक्रियाओं से आशंकित है। इसने उसे सच बोलने से रोक दिया है।

    पीड़िता के माता-पिता ने विरोध किया कि वह हलफनामे की सामग्री को जानती है और 25 वर्ष की आयु की है और ग्रेजुएट है।

    इस पर बेंच ने कहा,

    "वह पूरी तरह से डरी हुई है और उसके पास अपने परिवार का विरोध करने का कोई साहस नहीं है, विशेष रूप से पिता और भाई का, जो उसके साथ है।"

    बेंच ने इस बात की सराहना की कि जब तक युवती अदालत के सामने नहीं आई उसने अपने मन की बात नहीं बताई कि वह अपने पति के साथ जाना चाहती है।

    यह कहते हुए कि कोर्ट ने उस जाति के नेता से बात की जिसने बेंच को आश्वासन दिया कि कोई अप्रिय घटना होने की संभावना नहीं है। कोर्ट ने दंपति को चार सप्ताह के लिए सुरक्षा का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह निर्देश लक्ष्मीभाई चंदरगी बी और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य। (2021) 3 एससीसी 360 पर भरोसा करते हुए दिया। इस मामले में अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग माना गया है।

    कोर्ट ने कहा,

    "शिक्षित युवा लड़के और लड़कियां अपने जीवन साथी का चयन कर रहे हैं, जो बदले में समाज के पहले के मानदंडों से एक प्रस्थान है जहां जाति और समुदाय एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। संभवतः, यह आगे का रास्ता है जहां इस तरह के अंतर से जाति और समुदाय के तनाव कम हो जाएंगे। लेकिन इस बीच इन बच्चों को बड़ों से धमकियां मिल रही हैं और अदालतें इन बच्चों की मदद के लिए आगे आ रही हैं।"

    कोर्ट ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ और अन्य (2018) 7 एससीसी 192 पर भी भरोसा किया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि 'खाप पंचायत' या अन्य समूहों को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। कानून लागू करने वाली एजेंसियों इस बात को स्वीकार नहीं कर सकती।

    इसके बाद खंडपीठ ने देश में 'ऑनर क्राइम्स की शातिरता' और 'समाज पर इस तरह के अपराधों के विनाशकारी प्रभाव' पर चर्चा की। इस सामाजिक बुराई पर चर्चा करते हुए बेंच ने एनसीआरबी के आंकड़ों पर भरोसा किया। इसमें 2014 और 2016 के बीच ऑनर किलिंग के 288 मामले दर्ज किए गए।

    इसके अलावा, महिलाओं और घरेलू हिंसा के खिलाफ हिंसा को रोकने और मुकाबला करने पर यूरोप कन्वेंशन की परिषद का संदर्भ दिया।

    इसमें अनुच्छेद 42 में कहा गया है:

    "तथाकथित "सम्मान" के नाम पर किए गए अपराधों सहित अपराधों के लिए अस्वीकार्य औचित्य है।"

    यह चेतावनी देते हुए कि "किसी भी व्यक्ति की ओर से कानून अपने हाथ में लेने के किसी भी प्रयास से पुलिस सख्ती से निपटेगी," हाईकोर्ट ने पीड़िता के माता-पिता को उसके मूल सामान, गवाही और डिग्री प्रमाण पत्र देने का निर्देश दिया। इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।

    केस शीर्षक: ठाकोर देवराजभाई रमनभाई बनाम गुजरात राज्य ठाकोर देवराजभाई रमनभाई बनाम गुजरात राज्य

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