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क्या आईपीसी की धारा 375 के तहत वैवाहिक बलात्कार को अपवाद की श्रेणी में रखना पत्नी के यौन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है? गुजरात हाईकोर्ट विचार करेगा

LiveLaw News Network
15 Dec 2021 11:31 AM GMT
क्या आईपीसी की धारा 375 के तहत वैवाहिक बलात्कार को अपवाद की श्रेणी में रखना पत्नी के यौन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है? गुजरात हाईकोर्ट विचार करेगा
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गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने मंगलवार (14 दिसंबर) को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद 2 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 375 बलात्कार को अपराध बनाती है।

हालांकि, इसके अपवाद 2 में उस व्यक्ति को छूट दी गई है जो अपनी पत्नी का बलात्कार करता है यदि उसकी उम्र पंद्रह वर्ष से कम नहीं है।

न्यायमूर्ति जेबीपर्दीवाला और न्यायमूर्ति निराल आर मेहता की खंडपीठ ने अपने आदेश दिनांक 14.12.2021 में उल्लेख किया,

"यह सही समय है कि एक रिट अदालत इस बात पर विचार करने की कवायद करती है कि क्या आईपीसी की धारा 375 के अपवाद -2 को मनमाना करार दिया जा सकता है है और एक महिला के यौन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार को उसके पति की इच्छा के अधीन बनाता है। वर्तमान मुकदमे में कई अन्य बड़े मुद्दे उठाए गए हैं जिन पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है।"

रिट याचिका में भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद 2 की संवैधानिकता को मनमाना, अनुचित और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि अपवाद 2 महिला के शारीरिक निजता और यौन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार को उसके पति की मर्जी के अधीन बनाती है।

रिट याचिका में आगे तर्क दिया गया कि अपवाद कवर के सिद्धांत पर आधारित है जिसके तहत शादी के बाद महिला अपना खुद का अस्तित्व खो देती है और उसे अपने पति की संपत्ति के रूप में माना जाता है।

याचिका में तर्क दिया गया कि उपरोक्त सिद्धांत भारतीय संविधान के साथ असंगत है जो महिलाओं को पुरुषों के समान मानता है न कि अपनी पत्नी पर पति की जागीर के रूप में।

याचिका में कहा गया है,

"अपवाद 2 के पीछे का सिद्धांत हमारी संवैधानिक नैतिकता के साथ असंगत है और पत्नी के प्राकृतिक अंतर्निहित अधिकारों का उल्लंघन है, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, यौन स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता का अधिकार, प्रजनन विकल्पों का अधिकार, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता का अधिकार शामिल है।"

आगे कहा गया है कि ये सभी अधिकार संविधान द्वारा अनुच्छेद 14, 15, 19, 21, आदि के तहत मौलिक अधिकारों के रूप में गारंटीकृत और संरक्षित हैं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में मान्यता प्राप्त हैं।

यह प्रस्तुत किया गया कि वैवाहिक बलात्कार को दिए गए अपवाद ने पीड़ित- पत्नी और एक महिला जो पत्नी नहीं है, के बीच एक कृत्रिम भेद पैदा किया है। बलात्कार के खिलाफ कानूनी सुरक्षा महिलाओं को उपलब्ध है, लेकिन विवाहित महिला को अपने पति के खिलाफ इस सुरक्षा का आनंद नहीं मिलता है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि जहां पति अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए दंडित होने के लिए उत्तरदायी है, वहीं उसे बलात्कार के लिए दंडित नहीं किया जा सकता है।

याचिका में आगे कहा गया है कि धारा विवाहित और अलग हो चुकी महिलाओं के बीच मनमाने ढंग से भेद पैदा करती है; 15 वर्ष से अधिक आयु की महिलाएं और इस प्रकार मनमानी और असंवैधानिक है।

कोर्ट ने इन सबमिशन के आलोक में अपने आदेश में कहा कि यह उचित समय है कि एक रिट कोर्ट इस बात पर विचार करे कि क्या आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को स्पष्ट रूप से मनमाना कहा जा सकता है और यह एक महिला के यौन स्वायत्तता के मौलिक अधिकार को उसके पति की इच्छा के अधीन बनाता है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि भारत के महान्यायवादी और गुजरात राज्य को नोटिस जारी किया जाए।

केस का नाम: जयदीप भानुशंकर वर्मा बनाम भारत संघ

कोरम: न्यायमूर्ति जे.बी.पर्दीवाला, न्यायमूर्ति निराल.आर.मेहता

याचिकाकर्ता: सलिल ठाकोर

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