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"चार्जशीट दायर करने में हुई देरी के कारण POCSO मामलों में अभियुक्त को जमानत मिलना गंभीर चिंता का विषय", कलकत्ता हाईकोर्ट ने दिया धारा 164 के तहत तत्काल बयान दर्ज करने का निर्देश

LiveLaw News Network
19 May 2020 4:15 AM GMT
चार्जशीट दायर करने में हुई देरी के कारण POCSO मामलों में अभियुक्त को जमानत मिलना गंभीर चिंता का विषय, कलकत्ता हाईकोर्ट ने दिया धारा 164 के तहत तत्काल बयान दर्ज करने का निर्देश
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि यह ''एक गंभीर चिंता का विषय'' है कि लाॅकडाउन के चलते सीआरपीसी की धारा 164 के तहत न्यायिक बयान दर्ज नहीं करवाया जा सका और POCSO से संबंधित केस में आरोप पत्र दायर करने में देरी हो गई, जिसके परिणामस्वरूप मामले के आरोपी को जमानत मिल गई।

न्यायालय ने जिला न्यायाधीश को निर्देश दिया है कि वह यह सुनिश्चित करें कि बिना किसी देरी के POCSO से संबंधित मामलों में आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत बयान दर्ज कर लिए जाएं।

पीठ इस मामले में वेस्ट बंगाल कमीशन फाॅर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स की एक रिपोर्ट पर विचार कर रही थी। पीठ ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा कि एक आरोपी को सिर्फ इसलिए जमानत मिल गई क्योंकि आरोप पत्र दायर करने की वैधानिक अवधि समाप्त हो गई थी। इस तरह के मामले पीड़ित और गवाहों के मन में भय पैदा कर सकते हैं।

पीठ ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले में 2 सप्ताह में हलफनामा दायर करे,

''इस महामारी की स्थिति में, यह महत्वपूर्ण है कि बाल अधिकार सुरक्षित रहें। इसलिए हम हर जिले के पुलिस अधीक्षक को निर्देश देते हैं कि वे अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी पुलिस स्टेशनों के ऑफिसर इंचार्ज को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें कि वह अपने इलाके में सतर्कता बरतें। ताकि अपराधी इस लाॅकडाउन की स्थिति में कमजोर बच्चों का फायदा उठाकर उनका यौन शोषण न कर पाएं।''

चिल्ड्रन होम में रखे गए कैदियों के संबंध में अदालत ने महिला एवं बाल विकास व समाज कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव की तरफ से द्वारा दायर रिपोर्ट को देखा। जिसमें बताया गया था कि कुल 45 बाल कैदियों में खांसी और सर्दी जैसे लक्षण पाए गए हैं। उन सभी की चिकित्सकीय निगरानी की जा रही है।

पीठ ने कहा कि

''हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि 45 में से 19 कैदियों को फीवर क्लीनिक में ले जाया गया था और मेडिकल अधिकारियों ने उनका ब्व्टप्क्­19 का परीक्षण करवाने की कोई सिफारिश नहीं की थी। लेकिन 29 अप्रैल 2020 को दायर की गई इस रिपोर्ट में इस बात का खुलासा नहीं किया गया है इन घरों के शेष कैदियों की वर्तमान शारीरिक स्थिति कैसी है। रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि कुछ घरों में 2 या 3 बच्चों को खांसी-जुकाम से पीड़ित होने के बाद आइसोलेशन रूम में रखा गया था, लेकिन उक्त बच्चों की वर्तमान स्थिति के बारे में भी उक्त रिपोर्ट में कुछ नहीं बताया गया है।''

पीठ ने आगे कहा कि

''हमने 8 अप्रैल, 2020 को दिए गए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा था कि सभी घरों में पर्याप्त संख्या में बाल मनोवैज्ञानिक, नैदानिक मनोवैज्ञानिक और काउंसलर होने चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे मानसिक कष्ट या आघात से ग्रसित न हों।

हमने राज्य सरकार को भी यह निर्देश दिया था कि यह सुनिश्चित करें कि आवश्यक परामर्श प्रदान करने के लिए पर्याप्त प्रावधान कर दिए जाएं। हमने स्पष्ट रूप से यह भी कहा था कि उक्त स्वास्थ्य विभाग द्वारा दायर की जाने वाली रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि प्रत्येक जिले के लिए गठित मेडिकल टीम में काउंसलर और नैदानिक मनोवैज्ञानिकों और/ बाल मनोवैज्ञानिकों की संख्या कितनी है और उनके काम के प्रदर्शन के बारे में भी उल्लेख किया जाए। सभी काउंसलर के प्रदर्शन पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। उक्त रिपोर्ट को संयुक्त सचिव ने दायर किया है परंतु उक्त मुद्दे के बारे में कुछ नहीं बताया गया है।''

यह इंगित करते हुए पीठ ने महिला एवं बाल विकास व समाज कल्याण विभाग के सचिव और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि वह एक पखवाड़े के भीतर इस संबंध में अपनी-अपनी व्यापक रिपोर्ट दायर करें।

कोर्ट ने कहा कि

" जहां तक ​12 मई, 2020 को महिला एवं बाल विकास व समाज कल्याण विभाग के सचिव द्वारा दायर की गई रिपोर्ट की बात है तो उससे यह पता चलता है कि राज्य भर में प्रवासी श्रमिकों के लिए बनाए गए शिविरों में वर्तमान में 3502 बच्चे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सभी शिविरों में पर्याप्त भोजन, पीने के पानी और कपड़े धोने की सामग्री के प्रावधान हैं और सभी शिविरों में नियमित रूप से चिकित्सा जांच की जाती है। हालांकि, उक्त रिपोर्ट में ऐसे प्रवासी श्रमिकों के बच्चों की शारीरिक और मानसिक स्थितियों के बारे में कुछ नहीं बताया गया है।''

इस संदर्भ में, पीठ ने प्रत्येक जिले के जिला मजिस्ट्रेटों को आदेश दिया है कि वे अपने-अपने जिलों में रह रहे प्रवासी बच्चों की संख्या के संबंध में एक रिपोर्ट दायर करें। वहीं बाल और समाज कल्याण विभाग के सचिव के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग के सचिव को भी ऐसे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। प्रत्येक जिले में प्रवासी श्रमिकों के लिए बनाए गए शिविरों में रहने वाले बच्चों की मानसिक और शारीरिक स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट एक पखवाड़े या दो सप्ताह के भीतर दायर कर दी जाए।

उसके बाद पीठ ने उन सभी उपायों पर प्रकाश डाला, जिन्हें इन होम के लिए सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा प्रकाशित मानक संचालन प्रक्रियाओं से ही अपनाया जा सकता है। यह सभी उपाय एक आगंतुक या आउटसाइडर, होम के कीटाणुशोधन, सब्जियों और फलों के कीटाणुशोधन और कीटाणुशोधन पैक दूध से जुड़ी स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी चिंताओं से संबंधित हैं।

न्यायालय ने आयुष मंत्रालय द्वारा अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सुझाए गए विचारोत्तेजक उपायों को भी शामिल किया। जिनमें आयुर्वेदिक इम्युनिटी को बढ़ावा देने के उपाय और कुछ सरल आयुर्वेदिक प्रक्रियाएं शामिल हैं।

पीठ ने कहा कि

''महिला एवं बाल विकास व समाज कल्याण विभाग यह सुनिश्चित करे कि इस तरह के उपायों को लागू किया जाए और अगली तारीख पर एक अनुपालन रिपोर्ट दायर की जाए।''

अंत में, न्यायालय ने बाल अधिकार के मुद्दों से संबंधित सरकार के सभी विभागों को निर्देश दिया है कि वे आपस में तालमेल और संपर्क बनाए रखें। साथ ही यह देखें कि संस्थागत किए गए बच्चे या वो बच्चे जो किसी संस्था में नहीं रहते हैं ,यहां तक कि प्रवासी बच्चे भी इन सभी लाभ व उपायों का फायदा उठा पाएं।

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें





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