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अपने राजनीतिक हितों के लिए सरकार ने जानबूझकर संपत्ति कर की दरों में संशोधन नहीं कियाः मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई कॉर्पोरेशन को लगाई फटकार

LiveLaw News Network
18 Feb 2020 3:15 AM GMT
अपने राजनीतिक हितों के लिए  सरकार ने जानबूझकर संपत्ति कर की दरों में संशोधन नहीं कियाः मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई कॉर्पोरेशन को लगाई फटकार
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मद्रास हाईकोर्ट ने बुधवार को ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन को फटकार लगाई क्योंकि लगभग 20 वर्षों से संपत्ति कर दरों में संशोधन नहीं किया गया है, जिससे नागरिकों को सुविधाएं प्रदान करने के लिए आवश्यक राजस्व प्रभावित हुआ है।

न्यायमूर्ति एन. किरुबाकरन और न्यायमूर्ति पी .वेलमुरुगन की खंडपीठ ने कहा कि सभी सरकारों ने ''अपने राजनीतिक हित के लिए संपत्ति कर को जानबूझकर कर संशोधित नहीं किया था।'' यह भी पाया गया कि कुछ ''भ्रष्ट अधिकारी'' अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए व्यावसायिक इमारतों पर कम कर लगा रहे थे।

पीठ ने कहा कि-

''यह ज्ञात तथ्य है कि चेन्नई में संपत्ति कर का अंतिम संशोधन सिर्फ वर्ष 1998 के दौरान हुआ था। हालांकि, हर पांच साल में संपत्ति कर को संशोधित किया जाना चाहिए, परंतु सभी सरकारों ने जानबूझकर अपने राजनीतिक हित के लिए संपत्ति कर को संशोधित नहीं किया। उनको डर था कि संपत्ति कर में संशोधन करने के कारण,उनका चुनाव परिणाम प्रभावित होगा।''

पीठ ने कहा कि, ''निगम के अधिकारी विभिन्न बाहरी कारणों से संपत्ति कर लगाने में एकसमान यार्डस्टिक का पालन नहीं कर रहे हैं और वे आवासीय संपत्तियों के लिए ज्यादा कर और व्यावसायिक भवनों के लिए कम कर लगा रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप निगम को आय का नुकसान होता है। इसलिए, इस तरह के कामों में शामिल भ्रष्ट अधिकारियों का पता लगाने और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू किए जाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।''

अदालत ने यह टिप्पणी एक वकील वीबीआर मेनन की तरफ से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए की हैं। याचिका में मांग की गई है कि ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन क्षेत्र में स्थित इमारतों की सभी श्रेणियों के संबंध में मूल्यांकन अधिकारियों द्वारा संपत्ति करों का निर्धारण करने के लिए पारदर्शी और एकसमान नियम, प्रक्रियाओं और लागू दरों का निरूपण किया जाए या इनको बनाया जाए।

विशेष रूप से, राज्य अधिकारियों ने अंतिम बार वर्ष 1998 में संपत्ति कर दरों को संशोधन किया था। इसको देखते हुए अदालत ने कहा कि अगर 2003, 2008, 2013 और 2018 के दौरान संशोधन किए जाते तो यह निगम की आय को कई गुना बढ़ा सकते थे।

वहीं, यह पहली बार नहीं है कि जब अदालत ने संपत्ति कर दरों के संशोधन के मुद्दे पर राज्य की निष्क्रियता पर संज्ञान लिया है। जुलाई 2018 में, न्यायमूर्ति किरुबाकरन के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने 'श्याम शेखर बनाम केबी एडिसन, डब्ल्यूपी 2730/2018' नामक एक मामले में राज्य सरकार को संपत्ति कर की दरों के मामले में फिर से विचार करने के लिए कहा था। साथ ही कहा था कि आवासीय और गैर-आवासीय संपत्तियों,दोनों पर विचार किया जाए,परंतु इनको क्रमशः 50 प्रतिशत और 100 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है।

फिर भी, राज्य सरकार ने एक वर्ष के भीतर बढ़ी हुई कर दरों को वापस ले लिया, इसके लिए विभिन्न तिमाहियों में मिले ज्ञापनों या प्रतिनिधित्व का हवाला दिया गया था कि संशोधित दरें अनुचित रूप से 'भारी' थीं। वहीं संपत्ति कर के संशोधन से संबंधित मुद्दों पर गौर करने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन भी किया गया है।

डिवीजन बेंच ने इस समिति को आदेश दिया है कि वह जल्द से जल्द सिफारिशें दे, ताकि धन की उपलब्धता और पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति के मामले में निगम की स्थिति में सुधार हो सकें।

आदेश में कहा गया है कि-

''स्थानीय निकाय के साथ-साथ सरकार के पास भी नागरिकों को सभी सुविधाएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त धन होना चाहिए। पर्याप्त धन के अभाव के कारण ,वर्ष 2015 के प्रलय में जिन संपत्तियों का नुकसान हुआ था,उनके लिए निगम मुआवजे का भुगतान करने में असमर्थ है। वहीं कर्मचारियों की भी कमी है, क्योंकि निगम उनके वेतन का भुगतान करने की स्थिति में नहीं है और इसलिए, नई भर्ती नहीं हो पा रही हैं। इस कोर्ट के कहने के बाद 20 साल बाद किया गया संशोधन भी वापिस ले लिया गया। इन सबका पीड़ित केवल आम आदमी है। इसलिए, समिति द्वारा जल्द से जल्द सिफारिशें देने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।''

अदालत ने ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन के आयुक्त और नगरपालिका प्रशासन के सचिव को भी आदेश दिया है कि वे कुछ सवालों का जवाब देने के लिए 18 फरवरी को अदालत में मौजूद रहें। जो इस प्रकार हैं-

-वर्ष 1998 और 2018 में किए गए संशोधन के अनुसार एकत्र किया गया वार्षिक संपत्ति कर

- वर्ष 2018 में संपत्ति कर दरों में किए गए संशोधन को निलंबित करने या वापिस लेने के कारण

-समिति की सिफारिशें कब प्रस्तुत की जाएंगी

-चेन्नई में स्थित मॉल और आईटी कॉरिडोर, व्यावसायिक परिसरों की संख्या और इन इमारतों पर लगाई गई राशि या टैक्स।

- अगर वर्ष 2003, 2008 और 2013 में दरों में संशोधन कर दिया जाता तो एकत्रित अनुमानित संपत्ति कर

-व्यावसायिक इमारतों के लिए कम कर वसूलने के मामलों की संख्या या ऐसे कितने मामले सामने आए हैं।

मामले का विवरण-

केस का शीर्षक- वीबीआर मेनन बनाम राज्य

केस नंबर-डब्ल्यूपी नंबर 3265/2020

कोरम-जस्टिस एन. किरुबाकरन और जस्टिस पी.वेलमुरुगन

प्रतिनिधित्व- विशेष सरकारी वकील के. मकेष और स्थायी वकील कार्तिके अशोक (प्रतिवादियों के लिए)




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