'स्वातंत्र्यवीर' उपाधि जनता की देन, सरकार ने नहीं किया आधिकारिक ऐलान: अदालत में सावरकर के परिजन का बयान
Amir Ahmad
14 April 2026 1:22 PM IST

पुणे की विशेष सांसद-विधायक अदालत में चल रहे आपराधिक मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान विनायक दामोदर सावरकर को दी गई 'स्वातंत्र्यवीर' उपाधि को लेकर अहम बयान सामने आया। सावरकर के परपोते सत्यकि सावरकर ने अदालत को बताया कि यह उपाधि किसी सरकारी राजपत्र के जरिए नहीं दी गई बल्कि जनता ने उनके कार्यों के आधार पर उन्हें यह नाम दिया।
यह बयान उस समय आया, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर मानहानि मामले में सत्यकि सावरकर का क्रॉस एग्जामिनेशन चल रहा है। उनकी क्रॉस एग्जामिनेशन वकील मिलिंद पवार द्वारा की गई, जबकि मामले की सुनवाई जस्टिस अमोल शिंदे कर रहे हैं।
अपने बयान में सत्यकि ने कहा,
“स्वातंत्र्यवीर एक उपाधि है, कोई डिग्री नहीं। इस संबंध में कोई आधिकारिक सरकारी राजपत्र नहीं है। लोगों ने अपने आप सावरकर को स्वातंत्र्यवीर कहना शुरू किया।”
उन्होंने यह भी बताया कि अंडमान जेल में 1900 से 1940 के दशक तक सैकड़ों क्रांतिकारी बंद रहे लेकिन सभी को यह उपाधि नहीं मिली। उनके अनुसार इतिहास में कई ऐसे क्रांतिकारी हैं, जिनका उल्लेख या अध्ययन व्यापक रूप से नहीं हुआ, इसलिए उन्हें ऐसी उपाधियां नहीं मिल सकीं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र और असशस्त्र दोनों प्रकार के क्रांतिकारी थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि महात्मा की उपाधि केवल मोहनदास करमचंद गांधी को ही जनता ने दी, जबकि अन्य लोगों को नहीं। इसी तरह आजाद हिंद सेना के सभी सैनिकों को नेताजी नहीं कहा गया बल्कि यह संबोधन केवल सुभाष चंद्र बोस के लिए प्रयोग हुआ।
सत्यकि सावरकर ने यह भी कहा कि सावरकर के योगदान को स्वतंत्रता पूर्व और बाद के कई नेताओं ने सराहा। उन्होंने भगत सिंह, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सभी ने सावरकर के कार्यों को स्वीकार किया।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने आधिकारिक रूप से 'स्वातंत्र्यवीर' की उपाधि नहीं दी, लेकिन सावरकर के कार्यों के कारण उन्हें यह सम्मान मिला। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि सभी क्रांतिकारियों को समान सम्मान मिलना चाहिए।
सत्यकि ने कहा,
“मैं सभी क्रांतिकारियों का सम्मान करता हूं, लेकिन मेरा मानना है कि उस समय की सरकार को सभी को समान सम्मान देना चाहिए था।”
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विभिन्न लेखकों ने सावरकर के कार्यों की अलग-अलग व्याख्या की। कुछ उन्हें रणनीतिक बताते हैं तो कुछ उनकी आलोचना करते हैं। उनके अनुसार यदि कोई विचार ऐतिहासिक प्रमाणों पर आधारित है तो उसे ईमानदार माना जा सकता है, अन्यथा नहीं।

