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भगवान किसी भी समुदाय को मान्यता नहीं देते, मंदिर को सांप्रदायिक अलगाव का स्थान बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती : मद्रास हाईकोर्ट

Sparsh Upadhyay
18 Feb 2021 4:59 AM GMT
God Does Not Recognize Any Community, Temple Shall Not Be A Place For Perpetuating Communal Separation Leading To Discrimination
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God Does Not Recognize Any Community, Temple Shall Not Be A Place For Perpetuating Communal Separation Leading To Discrimination: Madras HC

यह देखते हुए कि व्यक्तियों के बीच वर्गीकरण का, भगवान के निवास-स्थान में कोई स्थान नहीं है, मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै बेंच) ने पिछले हफ्ते टिप्पणी की थी कि यह "बहुत दुर्भाग्यपूर्ण" था कि तिरुचि जिला के एक मंदिर के उत्सव के आयोजन पर लोगों के बीच मतभेद था।

न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एस. अनंथी की खंडपीठ ने श्री एरण्यमन थिरुकोविल के मंदिर उत्सव के आयोजन को लेकर 3 समुदायों के बीच एक शांति बैठक आयोजित करने की मांग करने वाली याचिका को खारिज करते हुए इस प्रकार अवलोकन किया।

मंदिर के लिए उपस्थित वकील ने अदालत के सामने प्रस्तुत किया कि वास्तव में इस वर्ष के लिए एक शांति समिति की बैठक आयोजित की गई थी, लेकिन कोई सहमति प्राप्त नहीं हुई थी। इसके बाद, मंदिर ने समारोह का संचालन करने का निर्णय लिया था।

इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए, अदालत ने त्योहार का संचालन करने के निर्णय को प्रतिवादी संख्या 8 [संयुक्त आयुक्त/कार्यकारी अधिकारी, अरुलमिगु जम्बुकेश्वर अकिंडलेश्वरी थिरुकोविल, थिरुविकिकोविल, त्रिची] के विवेक पर छोड़ दिया।

विशेष रूप से, बेंच ने देखा,

"व्यक्तियों के बीच वर्गीकरण का, भगवान के निवास-स्थान में कोई स्थान नहीं है। यदि ऐसी गतिविधियों की अनुमति दी जाती है, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ होगा।"

गौरतलब है कि कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी की कि,

"हम यह ध्यान देने के लिए विवश हैं कि मंदिर वह स्थान नहीं जहां सांप्रदायिक अलगाव को बढ़ावा दिया जाए जोकि भेदभाव को बढ़ाए। दूसरी ओर, मंदिर उन सभी लोगों को सुविधा प्रदान जिनकी समान आस्था और विश्वास है।"

यह देखते हुए कि एक मंदिर धार्मिक पूजा का स्थान है और यह विश्वास पर आधारित है, पीठ ने अंतिम रूप से कहा,

"जब लोग विश्वास/आस्था के चलते मंदिर में जाते हैं, तो उनके बीच रंग या पंथ के आधार पर कोई अंतर नहीं हो सकता है। मौजूदा मामले में, तीन समुदायों के व्यक्तियों के बीच मतभेद है। भगवान किसी भी समुदाय को नहीं पहचानते हैं। वह केवल एक इंसान, जो प्रार्थना करने के लिए वहाँ जाता है, उसे पहचानते हैं"

इस प्रकार रिट याचिका खारिज की गई।

संबंधित समाचार में, अक्टूबर 2020 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा था कि - "भारत एक ऐसा देश है, जो विभिन्न धर्मों, जातियों, जातियों और पंथों से संबंधित लोगों द्वारा बसा हुआ है। सभी लोग सद्भाव से रहते हैं। ज्यादातर लोग, एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं के प्रति सम्मान दिखाते हैं, लेकिन कुछ अवसरों पर, कुछ शरारती व्यक्ति, दूसरों की धार्मिक भावनाओं को आहत करके तनाव पैदा करने की कोशिश करते हैं।"

इसके अलावा, मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ) ने हाल ही में राज्य सरकार को भगवान मुरुगा को तमिल भगवान घोषित करने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दी थी।

"संविधान की प्रस्तावना देश की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति पर जोर देती है", कोर्ट ने 4 फरवरी को दिए आदेश में कहा था।

यह खबर अंग्रेजी भाषा में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:

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