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जस्टिस जीएस पटेल के नाम से जारी फर्जी आदेश सामने आया, जांच शुरू

LiveLaw News Network
19 Feb 2020 6:53 AM GMT
जस्टिस जीएस पटेल के नाम से जारी फर्जी आदेश सामने आया, जांच शुरू

मामले में एडवोकेट उमेश मोहिते और हेतल पांड्या ने शनिवार दोपहर 2 बजे जस्टिस पटेल के समक्ष शिकायत दर्ज की, जिसके बाद जस्टिस पटेल मामले में शामिल होने के लिए तुरंत अपने कक्ष में पहुंचे ‌थे।

बॉम्‍बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति गौतम पटेल के नाम पर एक फर्जी आदेश बनाने का मामला सामने आया है, जिसके बाद शनिवार दोपहर उन्होंने आपातकालीन बैठक बुलाई ‌थी।

न्यायमूर्ति गौतम पटेल ने 15 फरवरी को एक आदेश पारित किया और घोषणा की कि वसीयतनामे के एक मामले में 1 दिसंबर, 2019 की तारीख का एक जाली आदेश सामने आया है, जिसमें एक कथित याचिकाकर्ता, सतीश चंद्र गोराड‌िया को दो बैंक गांर‌टियों, जिनका मूल्य 51 लाख रुपए है, का उत्तराधिकारी बनाने को कहा गया है।

मामले में एडवोकेट उमेश मोहिते और हेतल पांड्या ने शनिवार दोपहर 2 बजे जस्टिस पटेल के समक्ष शिकायत दर्ज की, जिसके बाद जस्टिस पटेल मामले में शामिल होने के लिए तुरंत अपने कक्ष में पहुंचे ‌थे।

उन्होंने कहा-

"पूरा दस्तावेज एक फर्जीवाड़ा है। ऐसा कोई आदेश नहीं है। इसके कई कारण हैं। पहला, दस्तावेज हाईकोर्ट समान्य मूल नागरिक अधिकार क्षेत्र, राजस्व और संपत्ति प्रभाग का आदेश होने का दावा करता है, जबकि ऐसा कोई प्रभाग नहीं है। यह एक वाणिज्यिक उत्तराधिकार याचिका (एल) Nou 23520 2019 में होने का दावा करता है, जबकि ऐसी कोई कार्यवाही नहीं है और "वाणिज्यिक उत्तराधिकार याचिका" जैसी कोई कार्यवाही भी नहीं हो सकती है। पांच अंकों के लॉजिंग नंबर के साथ कोई वसीयतनामा याचिका भी नहीं है।"

न्यायमूर्ति पटेल ने 'जाली' आदेश के मिनट के विवरण का भी उल्‍लेख किया, जिससे साबित हो गया है कि आदेशा वास्तव में जाली था।

"दस्तावेज का पूरा फॉर्मेट, फांट, लाइन स्पेशिंग आदि, उस तरीके से नहीं है, जैसे मैं अपने आदेश देता हूं। तारीखों और पृष्ठ संख्या पर कोई फुटर भी नहीं है, जबकि यह प‌िछले कई सालों से मेरी प्रेक्टिस रही।

दस्तावेज के 1 दिसंबर 2019 को बनाए जाने का दावा है, जबकि उस दिन रविवार था। ऐसा कोई आदेश बन ही नहीं सकता है।"

न्यायमूर्ति पटेल की भाषा, शब्द चयन और विराम चिह्न के प्रयोग की शैली उनके आदेशों में दिखाई देती है। जाली आदेश में त्रुटियों का उल्‍लेख करते हुए उन्होंने आदेश से दो पैरा दर्ज कराए, 'जिनके कोई मतलब नहीं था'।

"इस दस्तावेज़ के जाली होने के कई ठोस उदाहरण हैं। इस दस्तावेज़ के अनुच्छेद 9 में मेरे एक आदेश के एक वाक्यांश को कॉपी किया गया है 'मैं सभी प्रार्थनाएं व्यवस्‍थ‌ित करूंगा' लेकिन यह उस फॉन्ट में नहीं है, जिसका मैं उपयोग करता हूं, उचित विराम चिन्हों का प्रयोग भी नहीं किया गया है। न्यायमूर्ति पटेल ने कहा कि अनुच्छेद 9C टाइपिंग की त्रुटियां भी हैं। " (fed के बजाय ‌field लिखा है।)

कोर्ट ने कहा कि जाली आदेश के बारे में परेशान करने वाला हिस्सा यह था कि इसे दो टर्म डिपॉजिट के संबंध में इस्तेमाल किए जाने की मांग की गई थी, पहला, इंडियन बैंक टर्म डिपॉजिट जिसकी मैच्योरिटी वैल्यू 25 लाख रुपए थी, और वह गैर हस्तांतरणीय के रूप में हस्ताक्षरित था, दूसरा बैंक ऑफ बड़ौदा था, जिसकी मैच्योरिटी वैल्यू 26 लाख रुपए थी, नॉमिनी वर्षा एस गोराड़िया (सतीशचंद्र की मां), जिन्हें दावेदार घोषित किया गया है, के साथ गैर हस्तांतरणीय के रूप में हस्ताक्षरित है।

जस्टिस पटेल ने कहा-

"सतीशचंद्र गोराडिया का निधन 15 दिन पहले ही हुआ था। इस आदेश को एडवोकेट उमेश वसंत मोहिते और एडवोकेट हेतल अरविंद पांड्या, पार्थ गोराडिया, सतीशचंद्र के भाई के पार्थ गोराडिया द्वारा संज्ञान में लाया गया था। पार्थ ने कहा कि उन्हें अपने पिता से यह दस्तावेज मिले थे और उनके पिता को अशोक वगेरिया से मिले थे।

कोर्ट में मौजूद मेरे चैंबर स्टाफ के साथ पूछताछ करने पर, हमने पाया कि इस अदालत के सिस्टम या रिकॉर्ड्स में एडवोकेट अशोक वगेरिया के रूप में कोई भी एडवोकेट पंजीकृत नहीं है और न ही ऐसा कोई भी व्यक्ति रजिस्टर्ड क्लर्क है।"

इस प्रकार, अदालत ने रजिस्ट्रार (कानूनी और अनुसंधान) को तुरंत उचित कार्यवाही करने का निर्देश दिया, साथ ही कहा, अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ यदि आवश्यक हो तो आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 340 (3) (क) और धारा 195 के तहत उचित कार्यवाही करें।

साथ ही, रजिस्ट्रार को इंडियन बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा, दोनों के हेड ‌ऑफिस को पत्र लिखकर, उन्हें कोर्ट के आदेश के बिना नकदीकरण या किसी भी लेन-देन को रोक लगाने को कहा गया।

कोर्ट ने कहा-

"ध्यान देना चाहिए कि उत्तराधिकार याचिका में मैं ऐसा कोई आदेश पारित नहीं कर सकता था क्योंकि दिसंबर 2019 में वसीयतनामा का कोई मामला मेरे पास नहीं था।"

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