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"याचिका बिना किसी होमवर्क के दायर की गई" :दिल्ली हाईकोर्ट ने जुर्माने के साथ जनहित याचिका खारिज की

LiveLaw News Network
23 Dec 2020 4:00 AM GMT
याचिका बिना किसी होमवर्क के दायर की गई :दिल्ली हाईकोर्ट ने जुर्माने के साथ जनहित याचिका खारिज की
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दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसे बिना किसी होमवर्क के याचिका दायर किया गया था। याचिका खारिज करने के साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को रु. 25,000/ का जुर्माना भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की खंडपीठ ने कहा कि राशि का उपयोग प्राधिकरण के "न्याय तक पहुंच" कार्यक्रम के लिए किया जाएगा।

कोर्ट रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने दावा किया था कि सार्वजनिक भूमि पर कई अनधिकृत संपत्तियों का निर्माण किया गया था। अपनी प्रार्थना में उन्होंने अदालत से इन संपत्तियों को ध्वस्त करने के लिए निर्देश जारी करने की मांंग की।

न्यायालय द्वारा किया गया पहला अवलोकन यह था कि इस याचिका को जनहित याचिका (PIL) नहीं माना जा सकता। दूसरे, यह ध्यान दिया गया कि याचिकाकर्ता ने कथित रूप से सार्वजनिक संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए इस याचिका के पक्षकारों के रूप में लोगों को शामिल नहीं किया था।

तदनुसार, खंडपीठ ने कहा कि इन संपत्तियों पर कब्जा करने वाले पक्षकारों की अनुपस्थिति में न्यायालयों द्वारा विध्वंस या हटाने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने टिप्पणी की कि चूंकि जनहित याचिका कोई होमवर्क किए बिना और आवश्यक पक्षों को शामिल किए बिना दायर की गई है, इसलिए इसे जुर्माना के साथ खारिज किया जाना उचित है।

कोर्ट ने कहा,

"अगर इस तरह की याचिकाएं इस कोर्ट द्वारा सुनी जाती हैं, तो इससे अन्याय बढ़ जाएगा।"

इसके अलावा, खंडपीठ ने कहा,

"अनाधिकृत निर्माण / अतिक्रमण को हटाने के लिए कोई भी आदेश पारित करने से पहले संबंधित अधिकारियों / नगर निगम द्वारा उचित नोटिस दिया जाना चाहिए और सुनवाई का एक अवसर संबंधित पार्टी को देना होगा।"

कोर्ट ने कहा कि इस उदाहरण में याचिकाकर्ता इस प्रक्रिया का पालन करने में विफल रहा है। इसके बजाय, याचिकाकर्ता द्वारा कुछ जानकारियों के आधार पर एक "जनहित याचिका" प्रस्तुत की गई, जो उन्हें कथित रूप से गुमनाम पीड़ितों से मिली थी।

केस टाइटल: रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स।

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