'धुरंधर' फ़िल्म-निर्माताओं को राहत, बलोच समुदाय पर आपत्तिजनक शब्द म्यूट करने पर हाईकोर्ट ने याचिका की बंद

Amir Ahmad

12 Jan 2026 1:44 PM IST

  • धुरंधर फ़िल्म-निर्माताओं को राहत, बलोच समुदाय पर आपत्तिजनक शब्द म्यूट करने पर हाईकोर्ट ने याचिका की बंद

    गुजरात हाइकोर्ट ने फिल्म 'धुरंधर' में बलोच समुदाय के खिलाफ कथित आपत्तिजनक संवाद हटाने की मांग को लेकर दायर याचिका को बंद कर दिया। फिल्म निर्माताओं की ओर से अदालत को यह जानकारी दिए जाने के बाद कि संबंधित शब्द को पहले ही म्यूट कर दिया गया, कोर्ट ने माना कि अब कोई विवाद शेष नहीं रह गया।

    यह मामला बलोच समुदाय से जुड़े दो व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिनमें उत्तर गुजरात बलोच समाज ट्रस्ट, पाटन के उपाध्यक्ष भी शामिल थे। याचिका में आरोप लगाया गया कि फिल्म में बलोच समुदाय को लेकर कुछ संवाद आपत्तिजनक और अपमानजनक हैं।

    9 जनवरी को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस अनिरुद्ध पी. मयी ने अपने आदेश में कहा कि फिल्म के निर्माताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि जिस शब्द पर आपत्ति जताई गई, उसे म्यूट कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने भी इस तथ्य से असहमति नहीं जताई। ऐसे में कोर्ट ने कहा कि अब याचिका निरर्थक हो गई और इसे समाप्त किया जाता है।

    उल्लेखनीय है कि 'धुरंधर' फिल्म का निर्देशन और निर्माण आदित्य धर द्वारा किया गया, जबकि इसका निर्माण जियो स्टूडियो और बी62 स्टूडियोज प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। फिल्म 5 दिसंबर को रिलीज हुई थी।

    याचिका में दावा किया गया कि फिल्म के एक संवाद में बलोच समुदाय का स्पष्ट उल्लेख करते हुए उन्हें अपमानजनक, भड़काऊ और घृणास्पद तरीके से दर्शाया गया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उक्त संवाद पूरे समुदाय को बेईमान और अविश्वसनीय बताता है, जिससे सामूहिक रूप से उनकी बदनामी होती है।

    याचिका में यह भी कहा गया कि संवाद के जरिए बलोच समुदाय का अमानवीय चित्रण किया गया, जिसमें उनकी तुलना एक जानवर से की गई और नकारात्मक नैतिक गुण थोपे गए। इसे संविधान के तहत गरिमा, पहचान और सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला बताया गया।

    इसके अलावा, याचिका में तर्क दिया गया कि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5बी के तहत ऐसी फिल्मों को प्रमाणन नहीं दिया जा सकता, जो सार्वजनिक व्यवस्था और जीवन के अधिकार के खिलाफ हों। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि पूरे समुदाय को अविश्वसनीय बताना असंवैधानिक है और मानव गरिमा का उल्लंघन करता है। संवाद को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की संबंधित धाराओं के तहत अपराध की श्रेणी में बताया गया।

    याचिका में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से फिल्म के निर्देशक के खिलाफ कार्रवाई, फिल्म के प्रमाणपत्र को निलंबित या संशोधित करने तथा आपत्तिजनक संवाद हटाए जाने तक फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई।

    हालांकि, फिल्म निर्माताओं द्वारा संवाद म्यूट किए जाने की जानकारी दिए जाने के बाद हाइकोर्ट ने माना कि अब कोई शिकायत शेष नहीं है। इसी आधार पर याचिका का निपटारा कर दिया गया।

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