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अपनी मर्ज़ी से शादी करने के बावजूद एक नाबालिक लड़की को बालिग होने तक उसके पति के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती : इलाहाबाद हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
7 Feb 2021 7:24 AM GMT
अपनी मर्ज़ी से शादी करने के बावजूद एक नाबालिक लड़की को बालिग होने तक उसके पति के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती : इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक नाबालिग लड़की को एक ऐसे व्यक्ति के साथ वैवाहिक संबंध में रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जो उसके पति होने का दावा करता है, भले ही उसने अपना घर छोड़ दिया हो और अपनी मर्जी से उस व्यक्ति से शादी कर ली हो, जिसे वह चाहती है।

न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर की खंडपीठ ने हाई स्कूल सर्टिफिकेट को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया। इसमें स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि वह नाबालिग है, क्योंकि उसकी जन्म तिथि 04 नवंबर 2004 है।

खंडपीठ ने विशेष रूप से कहा,

"जब तक लड़की नाबालिग है, तब तक उसे आरोपी पिंटू के साथ जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जिससे वह शादी करने का दावा करती है।"

न्यायालय के समक्ष मामला

हापुड़ में एक न्यायिक मजिस्ट्रेट ने निर्देश दिया था कि नाबालिग लड़की को उसके पति आरोपी पिंटू के साथ जाने की अनुमति दी जाए।

इस आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती देते हुए कहा गया कि मजिस्ट्रेट ने नाबालिग लड़की को अपने पति/ आरोपी के साथ रहने की अनुमति दी।

यह भी प्रस्तुत किया गया कि लड़की के बालिग न होने के कारण उसे अपने पति के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यदि ऐसा करना वैधानिक बलात्कार की श्रेणी में आएगा और बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 5/6 के तहत अपराध भी होगा।

यह भी तर्क दिया गया कि उसे वैवाहिक संबंध में रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जहां बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 12 के तहत उक्त विवाह अमान्य होगा।

कोर्ट का अवलोकन

शुरुआत में, कोर्ट ने पाया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 (2) यह स्पष्ट करती है कि स्कूल से जन्म प्रमाण पत्र की तारीख या मैट्रिक या समकक्ष प्रमाण पत्र के सामने संबंधित परीक्षा बोर्ड, पीड़ित की उम्र के बारे में अन्य साक्ष्यों पर गौर नहीं किया जा सकता है।

इस पृष्ठभूमि में, अदालत ने यह देखते हुए कि अव्यस्क लड़की का हाईस्कूल सर्टिफिकेट "स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि वह नाबालिग है।"

अदालत ने कहा,

"ऐसा कोई संदेह नहीं है कि उसके वयस्क होने के बारे में साक्ष्य, जो उसका रुख है, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसे उसकी आयु के निर्धारण के लिए चिकित्सीय परीक्षण के लिए नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि उसकी जन्मतिथि उसके हाई स्कूल सर्टिफिकेट पर उपलब्ध है।"

इसके अलावा, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या उस लड़की को उसके अभिभावक से अलग किया गया था या वह स्वयं घर से चली गई थी, न्यायालय ने लड़की की राय जानी और पाया कि उसने अपना घर अपनी मर्ज़ी से छोड़ा और आरोपी से शादी कर ली।

मामले के इस दृष्टिकोण में कोर्ट ने कहा,

"बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 12 के तहत विवाह शून्य (void) नहीं होगा, लेकिन उक्त अधिनियम की धारा 3 के तहत शून्यकरणीय ( voidable) होगा।"

कोर्ट ने यह भी कहा,

"इसलिए यह लड़की (prosecutrix) के लिए खुला रहेगा कि वह बालिग होने पर इस विवाह को स्वीकार करे या इसे शून्य घोषित करने का दावा करे। लड़की के बालिग होने पर यह भी उसके लिए खुला रहेगा कि वह अपनी मर्ज़ी से किसी के साथ रहे और जहां वह पसंद करे, वहां जाए।"

अंत में, न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

राज्य उसे नारी निकेतन के अलावा एक उपयुक्त राज्य सुविधा में रखे जो एक सुरक्षित घर / आश्रय गृह हो सकता है।

जिला मजिस्ट्रेट, हापुड़ और पुलिस अधीक्षक, हापुड़ को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि अभियोजन पक्ष को तुरंत एक उपयुक्त सेफ होम/शेल्टर होम, या अन्य राज्य सुविधा में रखा जाए जहाँ वह सुरक्षित रहे और उसकी देखभाल की जाए।

एक महिला न्यायिक अधिकारी को महीने में एक बार लड़की से मिलने और उसके कल्याण के बारे में पूछताछ करने के लिए निर्देशित किया गया।

अव्यस्क लड़की को 04 नवंबर 2022 तक राज्य की सुविधा/सुरक्षित घर/आश्रय गृह में रहने की अनुमति दी गई है और उसके बाद, वह जहाँ चाहे जा सकती है और जहाँ भी वह चाहे, पिंटू, जिसे वह अपना पति होने का दावा करती है, उसके साथ रह सकती है।

केस का शीर्षक - प्रदीप तोमर और अन्य बनाम यू.पी. राज्य और अन्य और [अनुच्छेद 227 के तहत मामले - नंबर 2020 की 4804]

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