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बिना सहमति बैंक खातों और आयकर रिटर्न की जानकारी का खुलासा निजता के अधिकार का उल्लंघन, पढ़िए हाईकोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
5 Sep 2019 6:05 AM GMT
बिना सहमति बैंक खातों और आयकर रिटर्न की जानकारी का खुलासा निजता के अधिकार का  उल्लंघन, पढ़िए हाईकोर्ट का फैसला
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एक महत्वपूर्ण फैसले में केरल के उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि किसी के बैंक खातों और आयकर रिटर्न के बारे में जानकारी, व्यक्तिगत और निजी जानकारी का गठन करती है, इसलिए वैधानिक समर्थन के बिना इस तरह की जानकारी का खुलासा करने की मांग करने से भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा। न्यायमूर्ति सी. के. अब्दुल रहिम और नारायण पिशारदी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।

यह निर्णय, डीलरशिप समझौतों के लिए बैंक खातों और आयकर रिटर्न का विवरण प्रस्तुत करने के लिए तेल विपणन कंपनियों के आग्रह के खिलाफ कई पेट्रोलियम आउटलेट खुदरा विक्रेताओं द्वारा दायर रिट अपील में दिया गया।

एकल पीठ ने खुदरा विक्रेताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसी जानकारी को निजता के अधिकार द्वारा संरक्षित किया गया था। यह देखा गया कि ऐसी जानकारी प्रस्तुत करने की शर्त, डीलरों द्वारा स्वेच्छा से निष्पादित डीलरशिप समझौतों का हिस्सा थी। एकल बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए, डीलरों ने डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया।

डिवीजन बेंच के समक्ष अपील करने वाले अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील संतोष मथु ने, के. पुट्टास्वामी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, जहां निजता को जीवन के अधिकार का पहलू घोषित किया गया था, पीठ के समक्ष रखा।

अपीलकर्ताओं की दलीलों से सहमत होकर, खंडपीठ ने कहा:

"इस तथ्य के संबंध में कोई संदेह नहीं हो सकता है कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते का विवरण व्यक्तिगत और निजी जानकारी का गठन करता है। बैंक में किसी व्यक्ति के खाते के विवरण से बैंक में जमा राशि और पूर्व में जमा की गई, तथा निकाली गयी राशि का पता चलता है। यह किसी व्यक्ति की वित्तीय क्षमता की स्पष्ट तस्वीर देगा।

यह तीसरे पक्ष के साथ हुए नकद लेनदेन का खुलासा करेगा। यह किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त और हस्तांतरित की गई राशि का खुलासा करेगा। बैंक से एक व्यक्ति द्वारा लिया गया ऋण भी इससे प्रदर्शित हो सकेगा। किसी व्यक्ति की आदत, उसकी जीवन शैली, अन्य व्यक्तियों के साथ उसका जुड़ाव और कई अन्य व्यक्तिगत मामलों को उसके बैंक खाते की करीबी जांच से समझा जा सकता है। इसलिए, हमें यह निर्धारित करने में कोई संदेह नहीं है कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते का विवरण, व्यक्तिगत जानकारी होती है और यह कि इस तरह की सूचना का खुलासा करने के लिए की गई कोई भी मांग, निजता के अधिकार के उल्लंघन होगी।"

जिला रजिस्ट्रार और कलेक्टर बनाम कैनरा बैंक: AIR 2005 SC 186 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए, अदालत ने कहा कि एक बैंक और उसके ग्राहकों के बीच बैंकिंग लेनदेन के संबंध में गोपनीयता का एक तत्व मौजूद होता है।

बेंच ने कहा:

"गोपनीयता का अधिकार, ग्राहक द्वारा बैंक को दी जाने वाली गोपनीय जानकारी के परिणामस्वरूप खो नहीं जाता है। बैंक को सूचना देने के साथ उसकी गोपनीयता नष्ट नहीं होती है। इसके अलावा, बैंक गोपनीयता बनाए रखने के लिए बाध्य है, जब तक कि इसके प्रकटीकरण की आवश्यकता, कानून द्वारा नहीं होती है। बैंक और ग्राहक के बीच का संबंध स्वभाव से काल्पनिक है। "

इसी तरह, न्यायमूर्ति अब्दुल रहिम द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया कि आयकर रिटर्न की जानकारी भी निजता के अधिकार के दायरे में आएगी।

"कोई भी जानकारी जो टैक्स देयता के निर्वहन के लिए आयकर विभाग को किए गए प्रेषण का खुलासा करती है, वह व्यक्तिगत जानकारी का गठन करेगी। किसी व्यक्ति द्वारा दायर आयकर रिटर्न को प्रस्तुत करने की मांग करने से उस व्यक्ति की निजता का हनन होगा।"

गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त (2013) 1 SCC 212 के निर्णय में सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8 के संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि, किसी व्यक्ति द्वारा अपने आयकर रिटर्न में विवरण का खुलासा, व्यक्तिगत जानकारी है।

न्यायालय, वरिष्ठ अधिवक्ता पी. गोपीनाथ मेनन के इस तर्क से सहमत नहीं था कि तेल विपणन कंपनियों द्वारा ऐसे विवरण की मांग करना, निजता के अधिकार पर एक उचित प्रतिबंध का गठन करेगा, क्योंकि यह मांग संभावित डीलरों की वित्तीय क्षमता का आकलन करने के लिए की गयी थी। यह आगे कहा गया था कि इस तरह की जानकारी की मांग, बेनामी डीलरशिप की प्रथाओं को रोकने में मदद करेगी।

इन दलीलों को खारिज करते हुए, न्यायालय ने कहा कि ऐसी मांग केवल एक कानून के आधार पर की जा सकती है, न कि कंपनियों द्वारा जारी एक परिपत्र के आधार पर।

"एक व्यक्ति और एक निकाय कॉर्पोरेट के बीच एक अनुबंध के आधार पर, उस व्यक्ति की गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। 2 पक्षों के बीच दर्ज किया गया अनुबंध, भले ही जहाँ एक पक्ष एक राज्य हो, कानून नहीं कहा जा सकता है।"

कोर्ट ने कंपनियों के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि टैक्स रिटर्न की जानकारी व्यक्तिगत या निजी नहीं थी।

"आयकर रिटर्न या किसी व्यक्ति के बैंक खाते के विवरण में कई अन्य जानकारी शामिल होती हैं। इस तरह के रिकॉर्ड/विवरण से अपीलकर्ताओं की डीलरशिप के विवरणों को अलग करना और उन्हें दूसरे प्रतिवादी को प्रस्तुत करना संभव नहीं होगा।"

चूंकि निजी जानकारी की इस मांग ने "वैधता का परीक्षण" (कि विवरण की मांग एक वैधानिक कानून पर आधारित है, जैसा कि पुट्टस्वामी के निर्णय में कहा गया है) पास नहीं किया, इसलिए, अदालत ने कहा कि इस बात पर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि क्या इस तरह की मांग से "आवश्यकता" और "आनुपातिकता" के परीक्षण संतुष्ट हुए हैं या नहीं।

अपील को अनुमति देते हुए, अदालत ने कहा कि कंपनियों को, "अपने रिटेल डीलरशिप जारी रखने के लिए एक शर्त के रूप में अपीलकर्ताओं को अपने आयकर रिटर्न और बैंक खाता विवरण प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने का कोई अधिकार नहीं है।"



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