सरकारी वकीलों की नियुक्ति को लेकर सुनवाई में अन्य वकीलों को बुलाने पर हाईकोर्ट ने लगाई पेश वकील को फटकार

Amir Ahmad

6 Jan 2026 7:12 PM IST

  • सरकारी वकीलों की नियुक्ति को लेकर सुनवाई में अन्य वकीलों को बुलाने पर हाईकोर्ट ने लगाई पेश वकील को फटकार

    दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार के पैनल वकीलों की नियुक्ति में कथित मनमानी को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान एक वकील को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने सुनवाई में शामिल होने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से अन्य वकीलों से सार्वजनिक अपील करने को न्यायिक मर्यादा और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमों का उल्लंघन बताया।

    चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने प्रथम पीढ़ी वकील संघ (फर्स्ट जनरेशन लॉयर्स एसोसिएशन) के अध्यक्ष एवं याचिकाकर्ता वकील रुद्र विक्रम सिंह को आड़े हाथों लिया। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के पैनल वकीलों की नियुक्ति में कथित मनमानी और पारदर्शिता की कमी को लेकर दायर की गई।

    सुनवाई के प्रारंभ में केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका प्रेरित है और आगामी दिल्ली बार काउंसिल चुनावों में रुद्र विक्रम सिंह की संभावित उम्मीदवारी के प्रचार का माध्यम बन रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि याचिका में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि संबंधित संघ किसी कानून के तहत पंजीकृत है या नहीं।

    इस पर रुद्र विक्रम सिंह ने स्वीकार किया कि वे चुनाव लड़ने पर विचार कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट किया कि याचिका को चुनावी प्रचार के रूप में इस्तेमाल करने का उनका कोई इरादा नहीं है।

    इसके बाद एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला देते हुए कहा कि संघ और स्वयं रुद्र विक्रम सिंह ने अन्य वकीलों से सुनवाई में शामिल होने के लिए लिंक साझा किया था। हालांकि सिंह ने इसका खंडन किया लेकिन अदालत ने इन पोस्ट्स पर गंभीर आपत्ति जताई।

    चीफ जस्टिस ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि संघ ने याचिका दायर की और स्वयं उसकी पैरवी कर रहा है तो अन्य लोगों को सुनवाई में शामिल होने के लिए सार्वजनिक रूप से बुलाने का औचित्य क्या है। उन्होंने इसे अदालत की कार्यवाही को बाधित करने जैसा बताया।

    जस्टिस तेजस कारिया ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह आचरण दिल्ली हाईकोर्ट के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025 का स्पष्ट उल्लंघन है, जिनके अनुसार केवल पक्षकार और उनके वकील ही सुनवाई में शामिल हो सकते हैं।

    अदालत ने इसे अनुचित और अशोभनीय आचरण बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर इस प्रकार के संदेश डालना प्रथम दृष्टया नियमों का उल्लंघन है। इस पर रुद्र विक्रम सिंह ने आश्वासन दिया कि ऐसे सभी पोस्ट तुरंत हटा दिए जाएंगे।

    चीफ जस्टिस ने उन्हें सीनियर के रूप में सलाह देते हुए कहा कि व्यवस्था से शिकायत होना समझा जा सकता है, लेकिन उसे व्यक्त करने का एक मर्यादित और वैधानिक तरीका होता है। उन्होंने कहा कि न्यायालय की गरिमा हर हाल में बनाए रखनी चाहिए और भावनाओं में बहकर ऐसी हरकतें नहीं की जानी चाहिए जिससे संस्थागत व्यवस्था को नुकसान पहुंचे।

    अंततः अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए 17 दिसंबर, 2025 के अपने पूर्व आदेश का हवाला दिया, जिसमें केंद्र सरकार को सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश जारी करने हेतु तीन माह का समय दिया गया। यह आदेश सॉलिसिटर जनरल द्वारा दिए गए उस बयान के बाद पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि केंद्र सरकार इस विषय पर उचित निर्णय लेकर एक तंत्र विकसित करेगी।

    अदालत ने निर्देश दिया कि वर्तमान याचिका को भी केंद्र सरकार के समक्ष एक प्रतिनिधित्व के रूप में माना जाए और संबंधित सक्षम प्राधिकारी आठ सप्ताह के भीतर इस पर निर्णय ले। साथ ही नीति या दिशा-निर्देश तय करते समय याचिका में उठाए गए मुद्दों पर भी विचार करने को कहा गया।

    उल्लेखनीय है कि याचिका में 21 नवंबर, 2025 को जारी सरकारी वकीलों की सूची को रद्द करने की मांग की गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि सूची में ऐसे वकीलों के नाम शामिल हैं, जो पात्र नहीं हैं, जिनमें हाल ही में नामांकित वकील और अखिल भारतीय बार परीक्षा उत्तीर्ण न करने वाले वकील भी शामिल हैं। याचिका में नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, स्पष्ट पात्रता मानदंडों के अभाव और निष्पक्ष चयन तंत्र न होने का भी आरोप लगाया गया।

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