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दिल्ली हाईकोर्ट ने नए आईटी नियमों के ट्रेसेबिलिटी क्लॉज को चुनौती देने वाली व्हाट्सएप की याचिका को 27 अगस्त तक के लिए स्थगित किया

LiveLaw News Network
30 July 2021 8:39 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने नए आईटी नियमों के ट्रेसेबिलिटी क्लॉज को चुनौती देने वाली व्हाट्सएप की याचिका को 27 अगस्त तक के लिए स्थगित किया
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दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 4 (2) के तहत उल्लिखित "ट्रेसेबिलिटी" क्लॉज को चुनौती देने वाली व्हाट्सएप की याचिका को 27 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उक्त क्लॉज केएस पुट्टुस्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में निहित एक व्यक्ति के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने भारत सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा एक सप्ताह के स्थगन की मांग के अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

पीठ ने कहा कि,

"प्रतिवादी नंबर 1 की ओर से पेश होने वाले वकील ने स्थगन की मांग की। अनुरोध की अनुमति है। इस मामले को 27 अगस्त को सुना जाएगा।"

व्हाट्सएप के अनुसार, ट्रेसबिलिटी क्‍लॅज निजी कंपनियों को हर दिन भेजे जाने वाले अरबों संदेशों में किसने-क्या-कहा और किसने-क्या-शेयर किया जैसी जानकारियों इकट्ठा करने के लिए मजबूर करता। इस क्लॉज के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सौंपने के लिए प्लेटफॉर्म को आवश्यकता से अधिक डेटा एकत्र करना पड़ेगा।

व्हाट्सएप ने कहा कि ट्रेसेबिलिटी निजी कंपनियों को उन लोगों के नाम की जानकारी रखने के लिए मजबूर करती है, जिन्होंने कुछ साझा किया है, भले ही उन्होंने इसे बनाया नहीं है, किसी चिंता के कारण साझा किया है, या पोस्ट की सटीकता की जांच करने के लिए साझा किया है। ऐसे रवैये से, निर्दोष लोग जांच में पकड़े जा सकते हैं या यहां तक कि जेल भी जा सकते हैं, ऐसी सामग्री साझा करने के लिए जो बाद में सरकार की नजर में समस्याग्रस्त हो जाती है, भले ही उन्हें पहली बार में इसे साझा करने से कोई नुकसान न हो।

कंपनी ने यह भी तर्क दिया है कि ट्रेसबिलिटी की आवश्यकता उसे अपनी मैसेजिंग सेवा पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को तोड़ने के लिए मजबूर करती है और सरकार के अनुरोध पर हमेशा के लिए भारत में भेजे गए प्रत्येक मैसेज के लिए पहले ओरिजनेटर की पहचान करने की क्षमता का निर्माण करती है।

याचिका में कहा गया है कि,

"संसद द्वारा अधिनियमित कोई कानून नहीं है जिसके लिए स्पष्ट रूप से एक इंटरमीडियरी की आवश्यकता होती है जो भारत में मैसेज के पहले ओरिजनेट की पहचान को उसके एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर सक्षम बनाता है या अन्यथा नियम बनाने के माध्यम से इस तरह की आवश्यकता को लागू करने के लिए अधिकृत करता है। नियम 4 (2) इस तरह की आवश्यकता को लागू करने का प्रयास करता है, लागू नियम एक वैध कानून नहीं है क्योंकि यह अधीनस्थ कानून है, जो एक मंत्रालय द्वारा पारित किया गया है न कि संसद द्वारा। यह मूल क़ानून की धारा 79 के विपरीत है।"

व्हाट्सएप केएस पुट्टुस्वामी बनाम भारत संघ के फैसले पर बहुत भरोसा करते हुए तर्क दिया कि उक्त आवश्यकता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित परीक्षणों को पास नहीं करती है और यह स्पष्ट रूप से मनमाना है। इसके साथ ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 और 69A का उल्लंघन है।

याचिका में आगे कहा गया है कि,

"नियम 4(2) न्यायिक निरीक्षण के बिना भारत में मैसेज के पहले ओरिजनेटर की पहचान करने के लिए आदेश जारी करने की अनुमति देता है, पूर्व न्यायिक निरीक्षण की तो बात ही छोड़ दें, जिसका अर्थ है कि राज्य की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ कोई गारंटी नहीं है। नियम 4 (2) इसलिए इसे रद्द कर दिया जाना चाहिए क्योंकि यह निजता के मौलिक अधिकार पर असंवैधानिक आक्रमण है।"

याचिका में बोलने और अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के उल्लंघन के रूप में नियम को चुनौती देते हुए कहा गया है कि एक बार जब नागरिकों को पता चलता है कि एसएसएमआई ने अपनी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाओं पर भारत में मैसेज के पहले ओरिजनेटर की पहचान करने की क्षमता का निर्माण किया है। इससे व्यक्ति इस डर से स्वतंत्र रूप से बोलने में सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे कि उनके खिलाफ उनके वैध निजी संचार का उपयोग किया जाएगा, जिससे उनके निजता और स्वतंत्र भाषण के अधिकारों का उल्लंघन होगा।"

केस का शीर्षक: व्हाट्सएप एलएलसी बनाम भारत संघ

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