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उपस्थित‌ि कम होने के मामले में परीक्षा से रोके गए छात्र को दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत दी

LiveLaw News Network
18 Jun 2020 8:44 AM GMT
उपस्थित‌ि कम होने के मामले में परीक्षा से रोके गए छात्र को दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत दी
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दिल्ली हाईकोर्ट ने जीजीएसआईपी यूनिवर्सिटी के एक छात्र को राहत दी है, उसे परीक्षा में शामिल होने और अगले सेमेस्टर की कक्षाओं में भाग लेने की अनुमति देने के बावजूद उपस्थिति में कमी के कारण रोक दिया गया था।

यूनिवर्सिटी के आदेश को रद्द करते हुए, जस्टिस जयंत नाथ की एकल पीठ ने कहा कि यूनिव‌र्सिटी सेमेस्टर परीक्षा शुरु होने से कम से कम 5 द‌िन पहले परीक्षा में न शामिल होने योग्य छात्रों के नाम की घोषणा करने की वैधानिक आवश्यकता का पालन करने में पूरी तरह से विफल रही है।

वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता ने 30 जनवरी, 2018 के एक आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें याचिकाकर्ता को सूचित किया गया था कि उपस्थिति कम होने के कारण उन्हें एंड सेमेस्टर की परीक्षा में शामिल होने से रोका जा रहा है।

याचिकाकर्ता ने आदेश को गैरकानूनी और मनमाना बताया था क्योंकि उसे पांचवीं सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने और छठें सेमेस्टर के लिए उपस्थिति प्राप्त करने की अनुमति दी गई थी। कई बार अभ्यावेदन करने के बावजूद, उसे इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली कि क्या वह पांचवी सेमेस्टर परीक्षा में बैठने के योग्य है?

याचिकाकर्ता ने अध्यादेश के खंड 9.2 पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि स्कूल के डीन/निदेशक/प्रधानाचार्य परीक्षा

शुरु होने से कम से कम 5 कैलेंडर दिनों पहले ऐसे छात्रों के नामों की घोषणा करेंगे, जो सेमेस्टर टर्म एंड परीक्षा में उपस्थित होने के योग्य नहीं हैं, साथ ही परीक्षा नियंत्रक को भी यह जानकारी दी जाएगी।

उपस्थिति के एकत्रीकरण के बारे में नोटिस न देने के आरोप को खारिज करते हुए, विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि माता-पिता को 09.09.2017 और 13.11.2017 को स्पीड पोस्ट केज जर‌िए व्यक्तिगत पत्र भेजे गए थे। 09.11.2017 को एक नोटिस भी प्रकाशित किया गया था, जिसमें छात्रों को उनकी कुल संचयी उपस्थिति को देखने की सलाह दी गई थी।

विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को उक्त नोटिस के आधार पर एडमिट कार्ड जारी नहीं किया गया था। हालांकि, उसे यह कहकर कि, एडमिट कार्ड कहीं रख दिया है, गलत तरीके से पांचवी सेमेस्टर की परीक्षा में उपस्थित हुई।

कोर्ट की टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय ने 28.11.2017 को नोटिस जारी किया है, जबकि प्रेक्टिकल परीक्षाएं 13.11.2017 को शुरू हुई थीं। इसलिए, नोटिस परीक्षा शुरू होने के काफी समय बाद जारी किया गया था।

अदालत ने कहा:

ऐसा इसलिए है क्योंकि परीक्षा शुरू होने से पहले छात्रों को 5 कैलेंडर दिनों पहले अग्रिम सूचना देने के बारे में कहा गया है कि वे सेमेस्टर परीक्षा में बैठने के लिए पात्र है या नहीं, यह छात्रों के लाभ के लिए एक शर्त है। यह एक छात्र को उपस्थिति की कमी के कारण परीक्षा में बैठने से रोकने की प्रक्रिया में निश्चितता लाता है। यह उन घटनाओं से प्रकट होता है, जिन्हें ऊपर कहा गया है कि प्रतिवादी अध्यादेश के खंड 9.2 के उक्त प्रावधान का पालन करने में विफल रहा।'

अदालत ने आगे कहा कि:

'याचिकाकर्ताओं को पांचवी सेमेस्टर की परीक्षा देने की अनुमति दी गई और बाद में जनवरी महीने में छठे सेमेस्टर की क्लास में बैठने की अनुमति दी गई थी। यह केवल 30.01.2018 है, जबकि उन्हें छठे सेमेस्टर कक्षाओं में भाग लेने से रोक दिया गया था। प्रतिवादी को अध्यादेश के खंड 9.2 की अनदेखी करने और उसी के विपरीत कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। '

इसी रोशनी में, न्यायालय ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के V से VIII सेमेस्टर के परिणाम घोषित करे।

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