सोनिया गांधी के खिलाफ FIR से इनकार करने वाला आदेश दिल्ली कोर्ट ने किया रद्द, कहा- आदेश में कारणों का अभाव
Amir Ahmad
21 Sept 2026 4:34 PM IST

दिल्ली कोर्ट ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के खिलाफ कथित तौर पर 1980 की मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के मामले में FIR दर्ज करने की मांग खारिज करने वाले मजिस्ट्रेट अदालत का आदेश रद्द किया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले 1980 की मतदाता सूची में शामिल किया गया और इसके लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
द्वारका कोर्ट के स्पेशल जज विशाल गोगने ने मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश को पूरी तरह बिना कारण वाला आदेश बताया। कोर्ट ने मामले को एसीजेएम अदालत में वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि पक्षों को सुनने, जांच कराने और संबंधित पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनने के बाद कारणों सहित नया आदेश पारित किया जाए। मामले को 29 सितंबर को एसीजेएम के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।
आदेश सुनाते हुए जज गोगने ने कहा कि किसी भी न्यायिक आदेश में कानून को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए और आदेश तथ्यों से आंख नहीं मूंद सकता। कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में किसी मतदाता या गैर-नागरिक का नाम छेड़छाड़ या धोखाधड़ी के जरिए शामिल किए जाने का आरोप हो तो इस बात पर कारणयुक्त आदेश जरूरी है कि क्या जालसाजी या धोखाधड़ी के आरोप प्रथम दृष्टया बनते हैं।
कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में इस बात पर कोई चर्चा नहीं की गई कि 1980, 1982 और 1983 की मतदाता सूचियों में सोनिया गांधी का नाम किस क्रम में शामिल, हटाया और दोबारा शामिल किया गया और शिकायत को पूरी तरह खारिज करने का आधार क्या था। अदालत ने कहा कि संज्ञेय अपराध के खुलासे से जुड़े पहलू पर एसीजेएम की ओर से पूरी तरह दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया।
स्पेशल जज ने कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी की दलीलें सुने बिना और संबंधित थाने से स्टेट्स रिपोर्ट मंगाए बिना आदेश पारित करना कानून की स्पष्ट त्रुटि है। अदालत ने यह भी कहा कि तथ्यों से जुड़े आरोपों पर उचित कारण नहीं दिए जाने के कारण निचली अदालत का आदेश प्रभावहीन हो गया। नागरिकता के मामले में केंद्र सरकार की शक्तियों और मतदाता सूची के संबंध में निर्वाचन आयोग की शक्तियों को लेकर एसीजेएम की रिसॉनिंग को भी अदालत ने अनुचित और गलत बताया।
हालांकि, आदेश रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह खुद एसीजेएम की जगह लेकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने की मांग पर फैसला नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा निर्णय लेने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास है और पुनरीक्षण अदालत खुद न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका नहीं अपना सकती।
इसलिए मामले को दोबारा एसीजेएम के पास भेज दिया गया, ताकि जांच कराने के बाद शिकायत में सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोपों से किसी अपराध के सामने आने या नहीं आने के पहलू पर कारणयुक्त आदेश पारित किया जा सके।
यह आदेश विकास त्रिपाठी की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर आया है। त्रिपाठी ने 11 सितंबर 2025 को एसीएमएम अदालत द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग खारिज कर दी गई।
त्रिपाठी की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बर्मन पेश हुए।
त्रिपाठी का दावा है कि सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में 1980 में शामिल किया गया था, जबकि उन्होंने 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल की थी। उनका आरोप है कि 1982 में मतदाता सूची से नाम हटाया गया और 1983 में दोबारा शामिल किया गया। इसी आधार पर उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज की जानी चाहिए।
मजिस्ट्रेट अदालत ने पहले शिकायत खारिज करते हुए कहा कि सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर की मांग पर विचार करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप होगा। अदालत ने यह भी कहा कि धोखाधड़ी या जालसाजी के कानूनी तत्वों को पूरा करने वाले आवश्यक विवरण के बिना केवल सामान्य आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ आरोप का स्थान नहीं ले सकते।
निचली अदालत ने यह भी कहा था कि शिकायतकर्ता मुख्य रूप से 1980 की कथित मतदाता सूची के एक ऐसे फोटोप्रति पर निर्भर कर रहा था, जो प्रमाणित मतदाता सूची की प्रति नहीं थी।
अब स्पेशल जज विशाल गोगने ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए मामले को एसीजेएम के पास वापस भेज दिया। एसीजेएम को संबंधित पक्षों और पुलिस अधिकारी को सुनने, आवश्यक जांच कराने तथा सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करने के बाद कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।
मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।

