इस अपराध ने समाज की आत्मा को छलनी किया: केरल कोर्ट ने मंदिर के पुजारी को अपनी सौतेली बेटी का बलात्कार करने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई

  • इस अपराध ने समाज की आत्मा को छलनी किया: केरल कोर्ट ने मंदिर के पुजारी को अपनी सौतेली बेटी का बलात्कार करने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई

    केरल कोर्ट ने (शनिवार) एक मंदिर के पुजारी को अपनी सौतेली बेटी का कई सालों से यौन उत्पीड़न करने के मामलें दोषी ठहराते हुए कहा कि, "अगर वार्ड के अभिभावक इस तरीके से व्यवहार करते हैं, तो वार्डों की रक्षा कौन करेगा? "

    केरल के अलप्पुझा जिले के हरिपद में फास्ट-ट्रैक कोर्ट के विशेष न्यायाधीश सलेना वीजी नायर ने पुजारी को कानून के तहत बलात्कार, यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी के लिए दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।

    जज ने कहा कि,

    "सौतेले पिता का वह घिनौना प्रकरण, जिसका पवित्र कर्तव्य पीड़ित की तरह अपनी ही बेटी की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना था, उसने उसे सबसे अधिक क्रूर और बर्बर तरीके से अपनी हवस पर काबू पाने के लिए अधीन किया, बलात्कार किया और भी जघन्य साबित कर दिया। किया गया यौन अपराध न केवल अमानवीय और बर्बर था, बल्कि यह बलात्कार का पूरी तरह से निर्मम अपराध था और समाज की मानवीय गरिमा के साथ खिलवाड़ था। अपराध की बर्बर प्रकृति ने मेरे न्यायिक विवेक को झकझोर दिया है। वह पीड़ित के लिए एक पिता की आकृति थी। उसने पीड़ित पर अपने नियंत्रण, अधिकार और प्रभुत्व का शोषण किया। उसने अपने घरेलू संबंधों का फायदा उठाया और अपनी हवस को संतुष्ट करने के लिए पीड़ित का इस्तेमाल किया। इसलिए वह सजा के मामले में किसी भी तरह की पैरवी नहीं करने का हकदार नहीं है। पहला आरोपी किसी भी तरह की पैरवी का हकदार नहीं है क्योंकि उसने ऐसा अपराध किया है जो 114 समाज की आत्मा को छलनी कर दिया। इस तरह से अपराध के लिए ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जिससेअपराधियों को एक संदेश मिले कि यह अपराध कितना घिनौना है।"

    उसे IPC की धारा 376 (2) (F), 376 (2) (i), 376 (2) (k) और 376 (2) (n), 377 और 506 (1) और PoCSO अधिनियम की धारा 5(n) के साथ 6, धारा 5(l) के साथ 6, धारा 5(i) के साथ 6, धारा 5(h) के साथ 6 और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 75 के तहत शामिल अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है।

    पृष्ठभूमि

    पुजारी (आरोपी) 13-वर्षीय लड़की (पीड़ित / पीडब्लू 1) का सौतेला पिता था। आरोप यह था कि उसने अपनी सौतेली बेटी का यौन उत्पीड़न किया और उसे धमकी दी कि अगर उसने अपनी मां (दूसरे आरोपी) को अपनी यौन पीड़ा सुनाई, या वह बताएगी कि उसके निजी अंगों को छुआ था और उसे इस बात का भी डर था कि उसकी मां को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाएगा।

    यह अभियोजन पक्ष का मामला था कि जब पीड़ित इस तरह के यौन उत्पीड़न और यौन हमलों को बर्दाश्त नहीं कर सकी, तो उसने अपनी मां को उसकी पीड़ा बताई। हालांकि, उसकी मां ने उससे कहा कि ये बात अब किसी और को मत बताना और वह उसका पिता है और यह ठीक है।

    मामला आखिरकार तब सामने आया जब पीड़िता ने अपनी चाची और एक रिश्तेदार के साथ मिलकर एक प्राथमिकी दर्ज कराई, जिसमें पुजारी द्वारा उसके साथ किए गए यौन शोषण का खुलासा किया गया।

    पुजारी के खिलाफ आईपीसी, POCSO एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) एक्ट के संबंधित प्रावधानों के तहत, और पीड़िता की मां के खिलाफ एबेटमेंट (जैसा कि उसने पादरी के आपराधिक कृत्यों को छुपाया) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

    जांच

    पीड़िता की उम्र

    सबसे पहले, न्यायालय ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 के संदर्भ में पीड़िता की आयु निर्धारित की।

    इस प्रावधान के अनुसार, प्रमाण के मानक का निर्धारण करने के लिए, पहली वरीयता स्कूल से जारी होने वाले जन्म प्रमाण पत्र या परीक्षा बोर्ड से मैट्रिकुलेशन या समकक्ष प्रमाण पत्र और इन दस्तावेजों की अनुपस्थिति में दी जाती है। स्थानीय प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए जन्म प्रमाण पत्र को पीड़ित की उम्र और इतने पर साबित करने के लिए भरोसा किया जाना है।

    इस मामले में, अभियोजन पक्ष ने स्कूल प्रवेश रजिस्टर का उद्धरण तैयार किया था। इस पर इनकार करने पर, कोर्ट ने कहा, "अभियोजन पक्ष के सबूतों से पता चलता है कि पीड़िता ने कथित रूप से पहली घटना (यौन शोषण) की तारीख को 12 साल की उम्र पार किया था, और इस तरह, पॉक्सो अधिनियम के तहत परिभाषित किए गए अनुसार पीड़ित एक 'बच्चा' था।"

    अपराध के बारे में

    मेडिकल रिपोर्ट और गवाह के बयानों जैसे रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री के माध्यम से, अदालत को यह विश्वास हो गया कि सबूत के मुताबिक ये कृत्य "घिनौने" हैं। इससे साबित होता है कि पुजारी ने पीड़ित पर यौन हमला किया।

    कोर्ट ने उल्लेख किया कि आरोपी (पुजारी) के कृत्यों के संबंध में पीडब्लू 1 (पीड़ित) के साक्ष्य को उसके पिछले बयानों द्वारा डॉक्टर, उसके रिश्तेदारों और पुलिस से पहले एफआईएस में, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 157 के तहत प्रदान किया गया है।

    यह प्रावधान इस बात की पुष्टि करता है कि किसी गवाह की गवाही की पुष्टि के लिए, इस तरह के गवाह से संबंधित किसी भी पूर्व बयान को उस तथ्य के बारे में या उस समय के बारे में, जब तथ्य की जांच करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम होने से पहले या किसी भी प्राधिकारी ने इसे साबित किया हो।

    पीड़ित गवाह नहीं

    आरोपी (पुजारी) ने आरोप लगाया था कि पीड़िता की चाची ने उसके साथ दुश्मनी की थी और इस तरह से पीड़ित को तंग किया था। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अन्य रिश्तेदार का उनके परिवार से कोई लेना-देना नहीं था और मामले में उनकी संलिप्तता किसी भी कारण से नहीं थी।

    हालांकि, न्यायालय ने निम्नलिखित अवलोकन के साथ इस विवाद को खारिज कर दिया कि,

    "उसके (पीड़िता के) के व्यवहार को उसकी परीक्षा के दौरान नोट किया गया था। वह पूरी तरह से टूट चुकी थी और उदास थी। जब उसे यह सुझाव दिया गया कि आरोपी ने कुछ भी नहीं किया है जैसा कि उसने दर्शाया है, तो अदालत ने उल्लेख किया कि उसने नकारात्मक रूप से जवाब दिया और कहा कि उसने कई बार उसका यौन उत्पीड़न किया। उसके सबूत दिया कि वह आरोपी से डरती थी और सहमी हुई थी। वह पूरी तरह से विश्वसनीय गवाह है और यहां तक कि बिना किसी पुष्टि के भी, न्यायालय के लिए आरोपी द्वारा किए गए अपराधों के कमीशन के बारे में उसके सबूत सुरक्षित रूप से काम कर सकते हैं।"

    आगे कहा कि, रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि पीड़िता द्वारा पुलिस के सामने घटनाओं का अचानक और अप्रत्याशित रूप से बताना, उसकी मां के रिश्तेदारों की किसी भी तरह की अस्थिरता का परिणाम नहीं था, जैसा कि आरोपी ने आरोप लगाया था, लेकिन यह जब वह थाने पहुंची और उसे खुलासा करने का मौका और साहस मिला, तब उसने आरोपी के कृत्यों के बारे में पुलिस को सबकुछ बताया।

    एफआईआर दर्ज करने में देरी घातक नहीं

    पुजारी ने तर्क दिया था कि कथित अपराधों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में एक वर्ष से अधिक की देरी है।

    न्यायालय हालांकि संतुष्ट था कि इस तरह की देरी के लिए पर्याप्त और उचित स्पष्टीकरण हैं।

    इसमें पाया गया कि पीड़िता एक साल से अधिक समय से दोनों आरोपियों के साथ रह रही थी और उनके नियंत्रण में थी।

    कोर्ट ने कहा कि,

    "आरोपी उसके सौतेले पिता और मां के अलावा कोई नहीं हैं। उसके सबूतों से पता चलता है कि वह पहले आरोपी द्वारा लगातार धमकी के अधीन थी, और इसलिए, वह किसी भी व्यक्ति को यौन उत्पीड़न को प्रकट करने की स्थिति और मानसिक स्थिति में नहीं थी।

    पीडब्लू 1 द्वारा सुनाई गई घटनाओं के अनुक्रम से यह स्पष्ट है कि वह कथित 1 वर्ष की अवधि के दौरान अभियुक्तों के प्रभुत्व, नियंत्रण और हिरासत में थी। अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के विश्लेषण पर यह देखा गया है कि, पीड़िता की स्थिति और परिस्थिति ऐसी थी कि, ढाई साल की उम्र में PW1 ने अपने पिता को खो दिया और उसके बाद उसे और उसकी तीन बड़ी बहनों को घर और उसकी देखभाल के लिए स्थानांतरित कर दिया गया। मां भी दूसरे संस्थान से जुड़ गई। यह इंगित करता है कि परिवार में उन्हें शरण देने, देखभाल या संरक्षण देने वाला कोई नहीं था।"

    इसने जोर दिया कि पीड़ित पूरी तरह से अभियुक्तों पर निर्भर था और उनके प्रभुत्व और हिरासत के तहत दर्ज किया गया था।

    "वे ही उसके केवल अभिभावक थे। उसकी बहनें देखभाल करती थीं। उन्होंने कहा, विटनेस बॉक्स में, कि उसने आरोपी के बारे में डर के कारण किसी भी व्यक्ति से उसकी पीड़ा के बारे में शिकायत नहीं की थी।

    PW1 ने अपनी जिरह में कहा है कि उसने स्कूल के अधिकारियों को सूचित करने के प्रयास किए थे, लेकिन आरोपी उन्हें समझाने में कामयाब रहे कि वह एक मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति है। ऐसी परिस्थिति में केवल यह सामान्य है कि वह पुलिस तक पहुंचने की स्थिति में नहीं थी। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि वह केवल 13 वर्ष की आयु में थी। उसके सौतेले पिता और मां कथित घटनाओं और यातनाओं के कथित पीड़ित और अपराधी हैं। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के विभिन्न फैसलों के माध्यम से यह तय किया गया है कि शिकायतों को दर्ज करने में देरी के प्रभाव को प्रत्येक मामले के अजीबोगरीब तथ्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर माना जाना चाहिए। इस मामले में एफआईआर दर्ज करवाने में एक वर्ष से अधिक देरी होना घातक नहीं है।

    मां का दोष

    जहां तक पीड़िता की मां का सवाल है, न्यायालय की राय थी कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि उसे आखिरी घटना तक पहले आरोपी द्वारा किए गए अपराधों के बारे में कोई ज्ञान था।

    अदालत ने कहा कि किसी भी कथित अपराध को करने में दोनों अभियुक्तों द्वारा साझा इरादे का कोई सबूत नहीं है। "इस प्रकार, दूसरा आरोपी पहले आरोपी द्वारा किए गए अपराधों के लिए रचनात्मक रूप से उत्तरदायी नहीं है।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "अभियोजन या PW1 के पास भी ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिसमें उसने जानबूझकर सहायता या यौन उत्पीड़न के आरोप में या किसी अधिनियम या गैरकानूनी चूक के आरोप में उस अपराध को अंजाम देने में पहले आरोपी की सहायता की हो। दूसरा, आरोपी पुलिस को इस मामले की यह रिपोर्ट करने में विफल रही कि जब आखिरी घटना उसे बताई गई थी, वह केवल उसी के लिए उत्तरदायी है।"

    अदालत ने माना कि अभियोजन यह साबित करने में सफल रहा कि अभियुक्त द्वारा यौन उत्पीड़न की अंतिम घटना के बारे में पीडब्लू 1 द्वारा दूसरे आरोपी को सूचित किया गया था, लेकिन वह पुलिस को वही रिपोर्ट करने में विफल रही। इसलिए यह POCSO अधिनियम इस तरह धारा 19 के तहत अपराध किया और इसी अधिनियम की धारा 21 के तहत दंड मिलेगा।

    इसके बाद यह ध्यान दिया गया कि उसके मामले में उपद्रवी परिस्थितियां विकट परिस्थितियों से आगे निकल गई हैं। इसलिए वह सजा के मामले में उदारता की हकदार है।

    कोर्ट ने कहा कि,

    "जहां तक दूसरी दोषी मां का संबंध है, स्थिति पूरी तरह से अलग है। यह सबूत में सामने आया है कि उसके पति की अप्रत्याशित रूप से मृत्यु हो गई, जिससे उसके परिवार में चार लड़कियों रहती थी। इसमें सबसे छोटे बच्ची (पीड़िता) पिता की मौत के समय सिर्फ ढाई साल की थी। उसके पास बच्चों की देखभाल के लिए घरों को सौंपने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था और वह खुद एक केयर होम में काम करने लगी। जिस संस्थान में आरोपी काम कर रहा थी, उसकी मां भी वहीं काम करती है। दोनों के बीच घनिष्ठता शुरू हो गई, जिसके परिणामस्वरूप उनकी शादी हुई। परिवार ने उसे स्वीकार किया, उस पर भरोसा किया।"

    इस प्रकार कोर्ट ने दूसरे अभियुक्त की सजा को ट्रायल के दौरान उसके द्वारा पहले से ही सुनाई गई सजा की अवधि तक सीमित कर दिया।

    आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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