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"कोर्ट मजबूर हालात में काम कर रहा है': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को जख्मी करने के मामले में दर्ज एफआईआर निरस्त करने की पति की याचिका ठुकराई, जुर्माना भी लगाया

LiveLaw News Network
14 Oct 2020 5:41 AM GMT
कोर्ट मजबूर हालात में काम कर रहा है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को जख्मी करने के मामले में दर्ज एफआईआर निरस्त करने की पति की याचिका ठुकराई, जुर्माना भी लगाया
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पति की वह याचिका जुर्माने के साथ खारिज कर दी जिसमें उसने गला घोंटकर पत्नी को घायल करने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307 के तहत दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) निरस्त करने की मांग की थी।

न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति संजय कुमार पचोरी की खंडपीठ ने यह याचिका दायर करने के लिए याचिकाकर्ता से गहरी नाराजगी भी जतायी और कहा कि कोर्ट मजबूर हालात में काम कर रहे हैं जहां बार और बेंच दोनों अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं।

कोर्ट ने आगे कहा,

"यह याचिका कोर्ट की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग है, जो जुर्माने के साथ खारिज किये जाने लायक है।"

इस प्रकार संबंधित रिट याचिका खारिज कर दी गयी, लेकिन याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

जुर्माने की राशि याचिकाकर्ता धर्मेन्द्र, पिता- किशनपाल, निवासी- वलीपुरा, थाना- कोतवाली शहर, बुलंदशहर, आदेश जारी होने की तिथि से एक माह के भीतर भुगतान करेगा। यह राशि बुलंदशहर के कलेक्टर भूराजस्व के तौर पर याचिकाकर्ता से वसूलेंगे।

ऑफिस को इस बारे में आवश्यक कार्रवाई करने को कहा गया है, साथ ही दो माह के भीतर आदेश पर अमल संबंधी रिपोर्ट कोर्ट रजिस्ट्री के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश कलेक्टर को दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि COVID-19 के कारण 25 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन घोषित किया गया था और उसके तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट एवं अधीनस्थ अदालतों में वर्चुअल सुनवाई शुरू की गयी थी। उसके बाद पूरे देश में, सभी स्तर के कोर्ट में केवल अर्जेंट और महत्वपूर्ण मामलों की ही सुनवाई हो रही है।

हाल ही में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने COVID-19 संक्रमण के "उच्च जोखिम" का हवाला देते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के लिए एक वकील को विकल्प देने से इनकार कर दिया था।

न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने एएसजीआई संजय कुमार ओम से कहा कि वर्चुअल सुनवाई के लिए उनके अनुरोध की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि उच्च न्यायालय का कंप्यूटर अनुभाग COVID-19 संक्रमण के लिए "उच्च जोखिम क्षेत्र" है और इसलिए वहां से किसी भी व्यक्ति को कोर्ट रूम/ चैम्बर के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

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