"यदि रिकॉर्ड पर सामग्री गलत साबित नहीं होती हैं तो सज़ा उचित रूप से संभव है": दिल्ली दंगों के मामले में अदालत ने छह के खिलाफ आरोप तय किए

  • यदि रिकॉर्ड पर सामग्री गलत साबित नहीं होती हैं तो सज़ा उचित रूप से संभव है:  दिल्ली दंगों के मामले में अदालत ने छह के खिलाफ आरोप तय किए

    दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों से संबंधित एक मामले में छह लोगों के खिलाफ आरोप तय किए। कोर्ट ने आरोप तय करते हुए कहा कि यह प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि यदि रिकॉर्ड पर सामग्री गलत साबित नहीं होती है तो आरोपी व्यक्तियों की सजा उचित रूप से संभव है।

    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने सुमित, नरेश उदय सिंह, दर्शन, विनोद कुमार और देवराज के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, 148, 395, 436 और 149 के तहत आरोप तय किए। वहीं आरोपी सुमित के खिलाफ आईपीसी की धारा 412 के तहत आरोप तय किए गए।

    एफआईआर अतीकुल रहमान नामक व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत पर दर्ज की गई। इसमें आरोप लगाया गया कि दंगाइयों ने उसकी फैक्ट्री को लूट लिया और आग लगा दी।

    इसके बाद याकूब नाम की एक अन्य शिकायत मिली। इसमें कहा गया कि उसकी टायर की दुकान का ताला खुला हुआ था, उसमें पड़ा सामान उठा ले गया और दुकान के बाहर ज्यादातर सामान जला दिया गया। उन्होंने शिकायत में विशेष रूप से कहा कि उनके मकान मालिक ने उनके दो बेटों के साथ उनकी दुकान में तोड़फोड़ और आगजनी की।

    चूंकि शिकायतकर्ता याकूब की दुकान अतीकुल रहमान की फैक्ट्री के आसपास पाई गई है, इसलिए याकूब की शिकायत को एफआईआर के साथ जोड़ दिया गया।

    कहा गया कि शिकायतकर्ता याकूब ने जांच अधिकारी को एक सीडी सौंपी। इसमें आरोपी सुमित दंगों की घटना में लिप्त नजर आ रहा है।

    उक्त वीडियो फुटेज में शिकायतकर्ता याकूब के साथ-साथ दो पुलिस अधिकारियों ने सभी छह आरोपियों की पहचान की। पुलिस अधिकारियों का बयान है कि उन्होंने शिकायतकर्ता याकूब की टायर की दुकान और अतीकुल रहमान की फैक्ट्री में तोड़फोड़ और आगजनी करने वाली दंगा भड़काने वाली भीड़ में सभी छह आरोपियों को देखा।

    कोर्ट ने कहा,

    "चूंकि यह उत्तर पूर्व जिले, दिल्ली में 24.02.2020 से 26.02.2020 तक हुए अभूतपूर्व बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगों से उत्पन्न होने वाला मामला है। इसमें बहुत बड़ी संख्या में दंगाई शामिल थे। साथ ही COVID-19 महामारी से उत्पन्न स्थिति को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन, गवाहों सीटी संदीप और सीटी सतेंद्र के बयानों को इस स्तर पर केवल देरी के कारण अविश्वास नहीं किया जा सकता है। उनकी सत्यता का पता लगाने के बाद और अधिक ठीक से पता लगाया जा सकता है।"

    इसमें कहा गया,

    "इस स्तर पर वायरल वीडियो या इन दो गवाहों के बयानों पर अविश्वास करना न्याय का मजाक होगा, जहां आरोपियों के खिलाफ आरोपों का फैसला किया जाना है। मौजूदा मामले में यह प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि यदि रिकॉर्ड पर सामग्री अप्रतिबंधित रहती है तो अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित रूप से संभव है।"

    अदालत ने आगे कहा कि दो दंगों की घटनाओं के संबंध में एकल संयुक्त आरोप पत्र दाखिल करने में कोई अवैधता या अनियमितता नहीं दिखाई देती है, क्योंकि दोनों घटना स्थल एक दूसरे के करीब थे।

    अदालत ने आदेश दिया,

    "उपरोक्त चर्चा के आलोक में यह माना जाता है कि किसी भी आरोपी को आरोप मुक्त करने का कोई मामला नहीं बनता है। आईपीसी की धारा 147/148/395/436 सपठित धारा 149 के तहत अपराधों के लिए आरोप उत्तरदायी हैं, इसलिए सभी आरोपियों के खिलाफ तय किया जाए। आईपीसी की धारा 412 के तहत अपराध के लिए आगे के आरोप भी आरोपी सुमित के खिलाफ तय किए जाने के लिए उत्तरदायी हैं।"

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