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उपभोक्ता फोरम का शैक्षिक संस्थानों परअधिकार क्षेत्र नहीं, वे 'सेवाएं नहीं देते : एनसीडीआरसी

LiveLaw News Network
23 Jan 2020 11:45 AM GMT
उपभोक्ता फोरम का शैक्षिक संस्थानों परअधिकार क्षेत्र नहीं, वे सेवाएं  नहीं देते  : एनसीडीआरसी
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राष्ट्रीय उपभोगता निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने सोमवार को यह कहते हुए एक संदर्भ का जवाब दिया है कि 'शैक्षणिक संस्थान' 'सेवाएं' प्रदान नहीं करते हैं और इसलिए उपभोक्ता फोरम के पास उनके खिलाफ दायर शिकायतों पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

इस निर्णय के साथ न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल (अध्यक्ष), न्यायमूर्ति वी.के जैन (सदस्य) और एम.श्रीशा (सदस्य) की पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के दो परस्पर विरोधी निर्णयों द्वारा बनाए गए गतिरोध को खत्म कर दिया।

2010 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय बनाम सुरजीत कौर, 2010 (11) एससीसी 159, के मामले में शिक्षण संस्थानों द्वारा सेवा की कमी के संबंध में शिकायत दर्ज करने के लिए उपभोक्ता फोरम के अधिकार क्षेत्र का विस्तार से वर्णन किया था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि वे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत 'सेवा प्रदाता' नहीं हैं और परीक्षा देने वाला छात्र 'उपभोक्ता' नहीं है।

इस निर्णय का पालन पी.टी कोशी और अन्य बनाम एलेन चैरिटेबल ट्रस्ट और अन्य 2012 (3) सीपीसी 615 (एससी) में किया गया और माना गया था कि, ''शिक्षा एक वस्तु नहीं है। शैक्षणिक संस्थान किसी भी तरह की सेवा प्रदान नहीं कर रहे हैं, इसलिए, प्रवेश व फीस आदि के मामले में, सेवा की कमी का सवाल नहीं हो सकता। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत उपभोक्ता फोरम द्वारा ऐसे मामलों पर विचार नहीं किया जा सकता है।''

हालांकि, इन निर्णयों से बेखबर सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य दो सदस्यीय खंडपीठ ने पी.श्रीनिवासुलु व अन्य बनाम वी.पी.जे अलेक्जेंडर और अन्य, सिविल अपील नंबर 7003-7004/2015 में कहा था कि शैक्षिक संस्थान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के दायरे में आएंगे और शिक्षा एक सेवा है।

इस कानूनी सवाल को हल करते हुए, एनसीडीआरसी ने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के मामले में निर्धारित कानून का पालन करने का निर्णय लिया। पीठ ने कहा कि यह फैसला मैरिट के आधार पर दिया गया था और अधिक विस्तृत और सटीक प्रतीत होता है।

अदालत ने अमर सिंह यादव व अन्य बनाम शांता देवी और अन्य, एआईआर 1987 पटना 191,मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा किया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के पूर्व निर्णय के संबंध में निर्णय लेते हुए कहा था कि जब सर्वोच्च न्यायालय की दो एकसमान पीठ के दो फैसलों के बीच सीधा टकराव होता है, तो अधीनस्थ न्यायालय को उस फैसले का पालन करना चाहिए, जो कानून को अधिक विस्तृत और सटीक रूप से बताता है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं रहता है कि वह फैसला पहले दिया गया था या बाद में।

आयोग ने कहा कि-

''महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय मामले (सुप्रा) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कानून पर विस्तृत रूप से चर्चा की थी। चूंकि महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (सुप्रा) मामले में गुण-दोष और कानून के प्रश्न पर विस्तार से विचार किया गया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिए गए फैसले का पालन पी.टी कोशी और अन्य (सुप्रा), प्रो के.के रामचंद्रन (सुप्रा) और नवीनतम केस अनुपमा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (सुप्रा) के फैसले में लगातार किया है।

हमारा मानना है कि अनुपमा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (सुप्रा) के अंतिम निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वार निर्धारित अनुपात का पालन किया जाना चाहिए।''

फिर भी, अदालत ने उल्लेख किया कि उपर्युक्त निर्णयों में से किसी ने भी यह जवाब नहीं दिया कि 'मूल शिक्षा'में क्या शामिल है और क्या शिक्षा /शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित सभी गतिविधियों को अधिनियम के दायरे से बाहर रखा जाएगा?

इस पहलू पर स्थिति स्पष्ट करते हुए आयोग ने माना कि संस्थान शिक्षा प्रदान करते हैं, जिसमें व्यावसायिक पाठ्यक्रम और प्रवेश के साथ-साथ प्रवेश के बाद की प्रक्रिया की गतिविधियां शामिल हैं और भ्रमण पर्यटन, पिकनिक, अतिरिक्त सह पाठ्यक्रम गतिविधियां, तैराकी, खेल इत्यादि गतिविधियां भी संचालित की जाती हैं, सिवाय कोचिंग संस्थानों को छोड़कर, ये सभी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के तहत नहीं आएंगे।

आयोग ने यह टिप्पणी उस शिकायत में की है, जिसमें एक डेंटल कॉलेज के खिलाफ सेवा की कथित कमी के आरोप लगाए गए थे। इस शिकायत में कहा गया था कि कॉलेज ने छात्रों को दाखिला दे दिया, जबकि यह कॉलेज न तो विश्वविद्यालय से संबद्ध था और न ही डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा मान्यता प्राप्त था।

मामले का विवरण-

केस का शीर्षक-मनु सोलंकी व अन्य बनाम विनायक मिशन विश्वविद्यालय (अन्य जुड़े मामलों के साथ)

केस नंबर- सीसी नंबर 261/2012

कोरम- न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल (अध्यक्ष), न्यायमूर्ति वीके जैन (सदस्य) और एम.श्रीशा (सदस्य)


आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करेंं



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