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महिला की नसबंदी के ऑपरेशन के बाद गर्भधारण मेडिकल लापरवाही नहीं : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
22 July 2020 5:15 AM GMT
महिला की नसबंदी के ऑपरेशन के बाद गर्भधारण मेडिकल लापरवाही नहीं : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि बच्चे की डिलीवरी के समय महिला की नसबंदी (tubectomy)करने वाले डॉक्टर ने अगर महिला को यह नहीं बताया कि डिलीवरी के बाद यह ट्यूब बाद में अपने सामान्य आकार में आ जाएगी और इस दौरान ट्यूब के स्लिप हो जाने की संभावना होती है और इस वजह से आगे गर्भधारण की संभावना होगी तो इसका मतलब यह नहीं है कि इसे चिकित्सकीय लापरवाही (Medical Negligence) माना जाएगा।

जस्टिस न्यायमूर्ति रेखा मित्तल की एकल जज की पीठ एक याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें चिकित्सा में लापरवाही के एवज़ में ₹1,50,000 की वसूली के निचली अदालत के 1994 के आदेश जिसे जालंधर के अतिरिक्त ज़िला जज ने आंशिक रूप से अनुमति दी थी, उसे चुनौती दी गई थी।

पीठ के समक्ष यह कहा गया कि प्रतिवादी को 1987 में अपीलकर्ता के क्लिनिक में चौथा बच्चा सीजेरियन ऑपरेशन से पैदा हुआ। अपीलकर्ता के कहने पर प्रतिवादी डिलीवरी के समय नसबंदी कराने को तैयार हो गई। प्रतिवादी को डॉक्टर ने आश्वासन दिया था कि नसबंदी के बाद वह आगे कभी गर्भ धारण नहीं कर पाएगी।

हाईकोर्ट के समक्ष प्रतिवादी ने कहा कि इस ऑपरेशन के बाद वह गर्भवती हो गई और इसकी वजह डॉक्टर की लापरवाही थी। उसने कहा कि इस गर्भधारण के कारण अपने रिश्तेदारों की नज़र में उसकी स्थिति हास्यास्पद हो गई है और उसे मानसिक संताप हुआ है कि उसे एक और बच्चे को जन्म देना होगा।

अदालत ने कहा,

"यह मुद्दा यह है कि अपीलकर्ता पर मेडिकल लापरवाही का दोषी माना जा सकता है या नहीं क्योंकि उसने प्रतिवादी को या उसके पति को यह नहीं बताया कि डिलीवरी के समय गर्भाशय का आकार बच्चे के आकार का हो जाता है और इसके आकार में में हुई इस वृद्धि के कारण ट्यूब का आकार भी बढ़ जाता है और यह डिलीवरी के बाद अपनी पूर्वावस्था में आ जाता है और इस दौरान इस बात की संभावना रहती है कि ट्यूब स्लिप हो जाए जिसकी वजह से आगे गर्भधारण हो सकता है।"

इस फ़ैसले को दरकिनार करते हुए एकल जज ने विभिन्न तरीक़ों से नसबंदी की विफलता के बारे में कहा कि पोमेरोय की तकनीक से नसबंदी की विफलता की दर 0.4%, लेप्रोस्कोपिक तरीक़े में 0.3 – 0.6% और मड्लेनेर तरीक़े में 7% होती है।

न्यायमूर्ति मित्तल ने कहा कि प्रतिवादी के वक़ील ने किसी मेडिकल पुस्तक या किसी की राय या किसी पेशेवर गायनोकोलॉजी/स्टरलाइज़ेशन विशेषज्ञ की राय का उल्लेख नहीं किया है कि सीजेरियन ऑपरेशन के समय नसबंदी नहीं करनी चाहिए।

अदालत ने कहा, "…इस मामले में नसबंदी सिर्फ़ इसलिए विफल हुई क्योंकि यह डिलीवरी के समय हुई।"

न्यायमूर्ति मित्तल ने कहा कि प्रतिवादी/वादी ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया है जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता की ओर से लापरवाही हुई। इसके उलट, प्रतिवादी और उसके पति ने यह स्वीकार किया है कि ऑपरेशन सही तरीक़े से हुआ और ऑपरेशन करने में सर्जन ने कोई लापरवाही नहीं की।

पीठ ने कहा,

"इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि अदालत का अपीलकर्ता को लापरवाही का दोषी मानना और उससे हर्ज़ाना वसूलना गलत है और इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती।"

इस तरह अदालत ने मुआवज़े के 26 साल पुराने आदेश को निरस्त कर दिया।

आदेश की प्रति डाउनलोड करें



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