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फोन पर जातिसूचक टिप्पणी एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
1 Jun 2020 7:57 AM GMT
फोन पर जातिसूचक टिप्पणी एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि व्यक्ति अगर अनुसूचित जाति समुदाय के किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ फ़ोन पर जाति सूचक टिप्पणी करता है तो यह अनुसूचित जाति अनुसूचित जन जाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं है।

अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की टिप्पणी का आशय शिकायतकर्ता को अपमानित करना नहीं है, क्योंकि ऐसा आम लोगों की नज़रों से दूर किया जाता है।

न्यायमूर्ति हरनेश सिंह गिल की एकल पीठ ने 14 मई को यह फ़ैसला दिया। इस मामले में निचली अदालत के एक फ़ैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें कुरुक्षेत्र, हरियाणा के दो लोगों के ख़िलाफ़ अपराध तय किया गया था, क्योंकि उन्होंने गांव के सरपंच को जान से मारने की धमकी दी थी और फ़ोन पर उसे जातिसूचक गालियां दी थीं।

अदालत ने कहा,

"आम लोगों की नज़रों से दूर इस तरह के शब्दों को सिर्फ़ बोलना शिकायतकर्ता को अपमानित करने की इच्छा स्पष्ट नहीं होती। सरपंच अनुसूचित जाति के हैं। इस तरह यह तथ्यात्मक रूप से अपराध की श्रेणी में नहीं आता जिसका एससी/एसटी अधिनियम के तहत संज्ञान लिया जाए।"

न्यायमूर्ति गिल ने कहा कि इस अधिनियम के तहत यह ज़रूरी है कि आरोपी ने एससी/एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति को अपमानित करने के उद्देश्य से डराया धमकाया हो। ऐसा तभी माना जाएगा, जब इस तरह की टिप्पणी सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक स्थल पर आम लोगों की मौजूदगी में की जाए।

अदालत ने कहा,

"एक बार जब यह स्वीकार कर लिया गया है कि यह कथित बातचीत मोबाइल फ़ोन पर हुई और आम लोगों के बीच नहीं हुई और न ही इसे किसी तीसरे पक्ष ने सुना, ऐसी स्थिति में जातिसूचक शब्द के प्रयोग के बारे में यह नहीं कहा आजा सकता कि ऐसा सार्वजनिक रूप से कहा गया।"

यह था मामला

26 अक्टूबर 2017 को दो लोगों – संदीप कुमार और प्रदीप कुमार के ख़िलाफ़ सरपंच राजिंदर कुमार ने आईपीसी और एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया। निचली अदालत ने 9 मई 2019 को इन लोगों के ख़िलाफ़ अपराध का निर्धारण का आदेश दिया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में में अपील की।

हाईकोर्ट याचिकाकर्ता की इस दलील से सहमत हुआ और उसने इसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। इस तरह अदालत ने याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ दायर एफआईआर को निरस्त कर दिया और उसके ख़िलाफ़ निर्धारित मामले को भी ख़ारिज कर दिया।

यह कहा गया कि एफआईआर में जिस अपराध की बात कही गई है उसके मुताबिक़ जानबूझकर अपमानित करने की बात अवश्य होनी चाहिए।

दूसरा यह आम लोगों की मौजूदगी में सार्वजनिक स्थल पर होनी चाहिए जबकि वर्तमान मामले में ऐसा नहीं हुआ है। इस तरह जिन आवश्यक शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है, वह नहीं पूरा हुआ है। चूंकि ये दंडात्मक प्रावधान हैं, …इसलिए इसमें किसी शर्त का पालन नहीं हो रहा है तो यह एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं हो सकता।

अदालत ने कहा,

"यह तय क़ानून है कि अगर दो मत बन रहे हैं और इनमें से एक अगर संदेह पैदा कर रहा है तो निचली अदालत के जज को यह अधिकार होगा कि वह आरोपी को बरी कर दे और ऊस स्थिति में यह नहीं देखा जा सकता कि मुक़दमे में आरोपी बरी होता है या दंडित।"

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