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'बाल संन्यास' वैध है; नाबालिग के स्वामी बनने पर कोई वैधानिक या संवैधानिक रोक नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
29 Sep 2021 6:22 AM GMT
बाल संन्यास वैध है; नाबालिग के स्वामी बनने पर कोई वैधानिक या संवैधानिक रोक नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने "बाल संन्यास" की वैधता को बरकरार रखा है। कोर्ट ने बुधवार को कहा कि नाबालिग के स्वामी बनने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।

कार्यवाहक चीफ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सचिन शंकर मखदूम की खंडपीठ ने एक रिट याचिका को खारिज़ करते हुए उक्त फैसला सुनाया। याचिका में 16 वर्षीय अनिरुद्ध सरलतया (अब वेदवर्धाना तीर्थ) को उडुपी स्थ‌ित श‌िरूर मठ का पीठाधिपति नियुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।

पीठ ने फैसले में कहा है,

"अन्य धर्मों में जैसे कि बौद्ध धर्म में कम उम्र के बच्चे भिक्षु बन चुके हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है कि किस उम्र में संन्यास/भिक्षा दी जा सकती है। कोई कानून भी नहीं है, 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति, जिसे संन्यास में दीक्षित किया जा रहा है, कोई संवैधानिक प्रतिबंध नहीं है।

और न्याय मित्र के तर्कों में उद्धृत धार्मिक ग्रंथ यह स्पष्ट करते हैं कि धर्म किसी व्यक्ति को 18 वर्ष की उम्र से पहले संन्यासी बनने की अनुमति देता है और ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है..।"

मौजूदा मामले में शिरूर मठ एक धार्मिक संप्रदाय है और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के अनुसार, प्रतिवादी सात एक संन्यासी बन गया है और उसे शिरूर मठ के पीठाधिपति के रूप में नियुक्त किया गया है। इसलिए, कल्पना की किसी भी सीमा में यह नहीं माना जा सकता है कि मठ की आवश्यक धार्मिक प्रथाएं संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है"।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा

"कल्पना के किसी भी सीमा में यह नहीं कहा जा सकता है कि किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने वर्तमान याचिका में किसी भी कानूनी प्रावधान के उल्लंघन की ओर इशारा नहीं किया है। प्रथा 800 वर्षों से जारी है।"

एडवोकेट डीआर रविशंकर के माध्यम से याचिकाकर्ता पी लाथव्य आचार्य की ओर से जारी याचिका में तर्क दिया गया था कि नाबालिग को "भौतिक जीवन के परित्याग" के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

याचिका में कहा गया था, "एक नाबालिग को वह करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है जो उसकी उम्र के अनुकूल नहीं है। एक नाबालिग का मुख्य पुजारी के रूप में अभिषेक करना बच्चे पर भौतिक जीवन का परित्याग थोपने के बराबर है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। संक्षेप में, संन्यास नहीं हो सकता क्योंकि इसके लिए उसे (नाबालिग) भौतिक जीवन का परित्याग करना होगा।",

याचिकाकर्ता की दलील दी थी कि "बाल संन्यास" बाल श्रम के समान है। मुद्दे को हल करने के लिए कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट एसएस नागानंद को एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया था, जिन्होंने दलील दी थी कि नाबालिग के स्वामी बनने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।

उन्होंने कहा था,

"18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को संन्यास में दीक्षित करने पर कोई कानूनी, संवैधानिक रोक नहीं है। इस मुद्दे का सामान्य‌ीकरण असंभव और अनुचित है। प्रत्येक मामले को तथ्यात्मक संदर्भ में देखना होगा।"

एमिकस क्यूरी ने कहा,

"किसी मठ के मुखिया का उत्तराधिकारी को नामित किए बिना निधन होने की स्‍थ‌िति में युग्मित मठ के प्रमुख के पास उत्तराधिकारी को नियुक्त करने का अधिकार होता है। मद्रास हाईकोर्ट की ओर से भीमनकट्टे मठ, एआईआर 1917 मैड 809 के मामले में दिए एक फैसले से इस प्रथा को न्यायिक मान्यता मिली है। एआईआर 1954 एआईआर 282 (शिउर मठ मामले) में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ ने घोषणा की है कि माधवाचार्य के अनुयायी एक धार्मिक संप्रदाय का गठन करते हैं और शिरूर मठ के अनुयायी धार्मिक संप्रदाय का का एक वर्ग हैं।"

बाल-संन्यास के संबंध में उन्होंने कहा,

"18 साल को वयस्कता की उम्र केवल बाध्यकारी अनुबंध में प्रवेश करने और वयस्क के रूप में जिम्मेदारियों को निभाने के लिए माना जाता है। यही वह उद्देश्य है, जिसके लिए वयस्‍क्ता अधिनियम, 1875 अधिनियमित किया गया था। 18 वर्ष को वयस्कता के उम्र के रूप में निर्धारित करते समय धारा 2 में एक विशिष्ट अपवाद शामिल किया गया है, जो कहता है कि अधिनियम में निहित कुछ भी भारत के नागरिकों के किसी भी वर्ग के धर्म या धार्मिक संस्कारों और प्रथाओं को प्रभावित नहीं करेगा...

इसलिए, धर्म या धार्मिक संस्कारों और प्रथाओं के प्रयोजनों के लिए जिन्हें संविधान के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय संधियों का संरक्षण प्राप्त है, एक व्यक्ति को केवल इस कारण से नाबालिग नहीं माना जा सकता है कि उसकी आयु 18 वर्ष से कम है।"

आगे दलील दी गई कि "उडुपी क्षेत्र में माधवाचार्य के अनुयायियों के बीच, विशेष रूप से अष्ट मठों में, केवल ब्रह्मचारी (अविवाहित, ब्रह्मचारी) को संन्यास दीक्षा देने की प्रथा है। हालांकि, इस संबंध में कोई कठोर नियम नहीं है कि एक व्यक्ति को एक निश्चित उम्र का होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि केवल कम उम्र के लड़कों को ही संन्यास में दीक्षा दी जाए।"

साथ ही, यह भी कहा गया, "यदि दीक्षित व्यक्ति की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो यह केवल संयोग है। बाल संन्यास का कोई नियम नहीं है। संन्यास के मामले में कोई बाध्यता या बल शामिल नहीं है। जब तक संबंधित व्यक्ति और उसके माता-पिता पूरे दिल से सहमति नहीं देते हैं, संन्यास दीक्षा नहीं दी जाएगी। बच्चे पर संन्यास थोपने जैसा कुछ नहीं है।"

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने भी सुनवाई योग्य न होने के आधार पर याचिका का विरोध किया।

केस शीर्षक: पी लाथव्य आचार्य और कर्नाटक राज्य

केस नंबर: डब्ल्यूपी 8926/2021

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