BREAKING | असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के कथित हेट स्पीच के खिलाफ वाम दल पहुंचे सुप्रीम, कार्रवाई की मांग
Amir Ahmad
10 Feb 2026 12:35 PM IST

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की नेता एनी राजा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा एक विशेष समुदाय को निशाना बनाकर दिए गए कथित भड़काऊ बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए आरोप लगाया कि शिकायतें दर्ज होने के बावजूद FIR दर्ज नहीं की जा रही हैं।
सीनियर एडवोकेट निज़ाम पाशा ने यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत के समक्ष उल्लेखित करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की।
उन्होंने कहा कि असम के मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए भाषण बेहद चिंताजनक हैं। पाशा ने हाल ही में सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट किए गए एक वीडियो का हवाला दिया, जिसमें मुख्यमंत्री को एक विशेष समुदाय के लोगों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया।
उन्होंने बताया कि इस वीडियो को भारी विरोध के बाद हटा दिया गया लेकिन अब तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं राजनीतिक लड़ाइयां सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी लड़ी जाने लगती हैं। यही समस्या है। हम इस पर विचार करेंगे और तारीख देंगे।”
सीपीआई(एम) और एनी राजा ने अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर कर मुख्यमंत्री के खिलाफ हेट स्पीच और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जुड़े अपराधों में FIR दर्ज करने की मांग की। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने का भी अनुरोध किया।
याचिकाओं में कहा गया कि राज्य और केंद्र की एजेंसियों से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।
याचिकाओं में वर्ष 2021 से फरवरी, 2026 तक मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए कथित बयानों और भाषणों की विस्तृत सूची पेश की गई।
इनमें आरोप लगाया गया कि मुख्यमंत्री ने बंगाली मूल के मुसलमानों के सामाजिक, आर्थिक और नागरिक बहिष्कार का आह्वान किया जिसमें उनके रोजगार, परिवहन, भूमि और मतदान अधिकारों से वंचित करने जैसी बातें शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इन बयानों के वास्तविक सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिले हैं जहां भेदभाव और उत्पीड़न को मुख्यमंत्री के कथित निर्देशों के नाम पर सही ठहराया गया।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि मुख्यमंत्री की बयानबाजी जानबूझकर अवैध घुसपैठ को मुस्लिम पहचान से जोड़ती है, जबकि घुसपैठ एक धर्म-निरपेक्ष मुद्दा है और एनआरसी के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि सूची से बाहर किए गए अधिकांश लोग गैर-मुस्लिम थे। इससे याचिकाकर्ताओं के अनुसार बयानों की सांप्रदायिक और भेदभावपूर्ण मंशा उजागर होती है।
याचिकाओं में कहा गया कि मुख्यमंत्री का यह आचरण संविधान के प्रति उनकी शपथ संप्रभुता, अखंडता, समानता और बंधुत्व बनाए रखने का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए इसे सार्वजनिक पद पर कर्तव्य के उल्लंघन और संवैधानिक विश्वास के हनन के रूप में बताया गया। साथ ही दावा किया गया कि ये बयान भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत हेट स्पीच और उकसावे से जुड़े अपराधों तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत चुनावी अपराधों के दायरे में आते हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे एक दिन पहले ही 12 अन्य व्यक्तियों ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल कर असम के मुख्यमंत्री की मिया मुसलमान, 'फ्लड जिहाद' जैसी टिप्पणियों का मुद्दा उठाया और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को विभाजनकारी बयान देने से रोकने के निर्देश मांगे थे।
इसके अलावा इस्लामिक धर्मगुरुओं के संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी हाल ही में मुख्यमंत्री के भाषणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।

