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[अनुच्छेद 227] रिट याचिका तभी सुनवाई योग्य हो सकती है यदि आर्बिट्रेटर के आदेश में उसके अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की प्रत्यक्ष कमी नजर आये : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
21 Sep 2020 5:21 AM GMT
[अनुच्छेद 227] रिट याचिका तभी सुनवाई योग्य हो सकती है यदि आर्बिट्रेटर के आदेश में उसके अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की प्रत्यक्ष कमी नजर आये : सुप्रीम कोर्ट
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उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 16 के तहत याचिका को खारिज किये जाने के खिलाफ भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर रिट याचिका पर तभी विचार किया जा सकता है जब आदेश दुराग्रहपूर्ण हो तथा जिसमें अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की प्रत्यक्ष कमी नजर आती हो।

अधिनियम की धारा 16 में प्रावधान है कि एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व या वैधता के संबंध में किसी भी आपत्ति पर फैसला देने सहित खुद के अधिकार क्षेत्र पर निर्णय दे सकता है। इस मामले में, आर्बिट्रेटर ने उसके अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने वाली एक अर्जी खुद खारिज कर दी थी। इसके बाद, संबंधित पक्षकार ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत एक रिट याचिका दायर करके इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी कि इस आदेश को ढाई साल की देरी से चुनौती दी गई थी और संबंधित पक्षकार ने इस मामले में ट्रिब्यूनल के समक्ष बहस लगभग पूरी हो जाने के बाद अंतिम समय में रिट याचिका दायर की थी।

न्यायमूर्ति रोहिंगटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर विचार करते हुए ने 'दीप इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम तेल एवम् प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड' मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया और कहा :

"हमारा मत है कि आर्बिट्रेटर द्वारा धारा 16 के तहत दायर अर्जी खारिज किये जाने के खिलाफ रिट कोर्ट का दरवाजा केवल तभी खटखटाया जा सकता है यदि पारित आदेश इतना दुराग्रहपूर्ण हो कि उसका एक मात्र निष्कर्ष यह निकले कि सन्निहित अधिकार क्षेत्र में स्पष्ट कमी है। अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र में कमी को लेकर किसी भी दलील की कोई जरूरत नहीं होती है- केवल आदेश दुराग्रहपूर्ण होना स्पष्ट दिखना चाहिए।"

बेंच ने अपीलकर्ता पर हालांकि 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाकर विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए आगे कहा :

दुर्भाग्यवश, पार्टियां अनुच्छेद 227 के तहत रिट कोर्ट जाने को लेकर 'दीप इंडस्ट्रीज लिमिटेड मामले' में हमारे दिये गये फैसले का इस्तेमाल उन मामलों में भी करती हैं जिनमें अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट कमी नजर नहीं आती है। यह मामला भी वैसे ही मामलों में से एक है। अलग तथ्यों के आधार पर रिट याचिका खारिज करने के बजाय हाईकोर्ट को दीप इंडस्ट्रीज लिमिटेड मामले में हमारे फैसले का उल्लेख करना उचित होता और हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका को इस आधार पर खारिज किया होता कि आर्बिट्रेटर के संबंधित आदेश में ऐसा कोई दुराग्रह नहीं है जिससे अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की प्रत्यक्ष कमी नजर आ रही हो। हाईकोर्ट को भारी जुर्माना लगाकर इस तरह के वाद को हतोत्साहित करना चाहिए। हाईकोर्ट ने इन दोनों चीजों में से एक भी काम नहीं किया।

केस का नाम: पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम एमता कोल लिमिटेड

केस नं. : विशेष अनुमति याचिका (सिविल) नं. 8482/2020

कोरम : न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन, न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी

वकील : सीनियर एडवोकेट के. वी. विश्वनाथन, एडवोकेट अभिमन्यु भंडार

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