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सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली अर्जी महज विलंब के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती: कलकत्ता हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
4 Oct 2021 4:36 AM GMT
सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली अर्जी महज विलंब के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती: कलकत्ता हाईकोर्ट
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Application U/s 156(3) CrPC Seeking Registration Of FIR Cannot Be Dismissed Merely On The Ground Of Delay: Calcutta High Court

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक मजिस्ट्रेट केवल शिकायत दर्ज करने में देरी के आधार पर आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156 (3) के तहत आवेदन खारिज नहीं कर सकता है।

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी ने कहा कि मजिस्ट्रेट यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि शिकायत दर्ज करने में देरी के कारण यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आवेदन को अत्यधिक देरी के आधार पर प्राथमिकी के रूप में नहीं माना जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि 'ललिता कुमारी' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में संहिता की धारा 156 (3) के तहत एक आवेदन को प्रारंभिक जांच या एफआईआर के समान मानते हुए जांच के लिए पुलिस प्राधिकरण को भेजे बिना देरी के आधार पर फेंकने का कोई निर्देश नहीं है।

इस मामले में, मजिस्ट्रेट ने मुख्य रूप से इस आधार पर संहिता की धारा 156 (3) के तहत आवेदन खारिज कर दिया था कि आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्राथमिकी की अर्जी में असामान्य देरी हुई थी। मजिस्ट्रेट ने उल्लेख किया कि कथित घटना 29 नवंबर, 2018 को हुई थी और याचिकाकर्ता ने लगभग दो साल बीत जाने के बाद 12 नवंबर, 2020 को शिकायत दर्ज कराई थी और इस तरह की शिकायत दर्ज करने में देरी का स्पष्टीकरण संतोषजनक और ठोस नहीं था।

कोर्ट के समक्ष यह दलील दी गई थी कि 'ललिता कुमारी (सुप्रा)' मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कभी भी मजिस्ट्रेट को देरी के आधार पर संहिता की धारा 156 (3) के तहत एक आवेदन को सीधे खारिज करने का अधिकार नहीं देता है। उसी से सहमत होकर, अदालत ने कहा:

18. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि अधिकांश बार शिकायत दर्ज करने में अस्पष्टीकृत देरी अभियोजन के लिए घातक साबित होती है। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णय हैं जहां यह माना जाता है कि यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने में देरी लिखित शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं है। प्राथमिकी दर्ज करने में देरी का ज्यादा महत्व नहीं है क्योंकि पीड़िता को खुलकर सामने आने और रूढ़िवादी सामाजिक परिवेश में खुद को अभिव्यक्त करने के लिए साहस जुटाना पड़ता है। बलात्कार के मामलों में, अभियोक्ता द्वारा सभी परिस्थितियों में प्राथमिकी दर्ज करने में देरी का कोई महत्व नहीं है। कभी-कभी सामाजिक कलंक का डर और कभी-कभी आरोपी व्यक्तियों से डर कि उस पर और अधिक हमले किए जा सकते हैं, और धनी, बाहुबली और ताकतवार आदमी के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू करने के लिए शारीरिक आंतरिक शक्ति की अनुपस्थिति शिकायत दर्ज करने में देरी के कारण हैं।

कोर्ट ने 'मुकुल रॉय बनाम पश्चिम बंगाल सरकार (2019) Cri.LJ 245 (Cal)' में एकल पीठ के फैसले से भी असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि मजिस्ट्रेट आरोपों की सच्चाई और सत्यता को सत्यापित करेगा, क्योंकि मामले में आरोप की प्रकृति रिकॉर्ड पर है।

"माननीय न्यायाधीश के प्रति पूरे सम्मान के साथ, उक्त निर्देश 'ललिता कुमारी' मामले के पैरा 120.5 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देश के अनुरूप नहीं है। माननीय एकल न्यायाधीश स्पष्ट रूप से निर्देश देते हैं कि प्रारंभिक जांच का दायरा प्राप्त जानकारी की सत्यता या असत्यता सत्यापित करने के लिए नहीं है, बल्कि केवल यह पता लगाने के लिए है कि क्या जानकारी किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है। जब पुलिस अधिकारी संज्ञेय अपराध के लिए रजिस्ट्रेशन से पहले प्रारम्भिक जांच मामले में सत्यता को सत्यापित करने का हकदार नहीं है, तो एक मजिस्ट्रेट सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत आवेदन में निहित आरोपों की सच्चाई और सत्यता को कैसे सत्यापित कर पाएगा? उपरोक्त के मद्देनजर और ललिता कुमारी के फैसले के अनुरूप, यह अदालत मानती है कि संहिता की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन पर विचार करते वक्त मुकुल रॉय मामले का सब-पैराग्राफ (4) मजिस्ट्रेट द्वारा पालन किया जाने वाला सही दिशानिर्देश नहीं है।"

कोर्ट ने कहा कि संहिता की धारा 156(3) के तहत आवेदन मिलने पर मजिस्ट्रेट के लिए दो वैकल्पिक कार्रवाई का रास्ता खुला रहता है।

1. मजिस्ट्रेट संहिता की धारा 190 के तहत संज्ञान लेने से पहले सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत पुलिस द्वारा जांच के लिए कह सकता है।

2. यदि मजिस्ट्रेट ठीक समझे तो वह शिकायत की याचिका पर संज्ञान ले सकता है और संहिता की धारा 202 में निहित प्रक्रिया का पालन कर सकता है।

मजिस्ट्रेट के बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए अदालत ने कहा:

28. इससे पहले कि मैं अलग हो जाऊं, मैं प्राथमिकी दर्ज करने में देरी के प्रभाव का उल्लेख करने के लिए उत्सुक हूं। एक आपराधिक मामले में एफआईआर एक संज्ञेय अपराध की शुरुआत का सबसे पहला कथन है। यह सबूत का एक वास्तविक हिस्सा नहीं है और इसे परीक्षण में या तो पुष्टि या विरोधाभास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। शिकायत दर्ज करने में देरी को घटना के झूठे विवरण, अलंकरण और भौतिक तथ्य के दमन के आधार के रूप में माना जाता है। 29. ऐसे सभी बिंदुओं का निर्णय न्यायालय द्वारा किसी मामले की सुनवाई के दौरान किया जाना है। संहिता की धारा 156(3) के तहत आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट शिकायत दर्ज करने में देरी के प्रभाव का फैसला नहीं कर सकता है। ललिता कुमारी मामले में दिया गया निर्णय पुलिस प्राधिकरण को शिकायत दर्ज करने में अत्यधिक देरी पर प्रारंभिक जांच का अधिकार देती है। सुप्रीम कोर्ट 'ललिता कुमारी' मामले में कभी भी यह निर्देश नहीं देता कि वह किसी आवेदन को प्रारंभिक जांच या प्राथमिकी मानकर जांच के लिए पुलिस प्राधिकारी को भेजे बिना देरी के आधार पर संहिता की धारा 156(3) के तहत खारिज कर दें।

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