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घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत अर्जी सीआरपीसी की धारा 468 के अंतर्गत लिमिटेशन के दायरे में प्रतिबंधित नहीं होती : कर्नाटक हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
19 May 2021 5:03 AM GMT
घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत अर्जी सीआरपीसी की धारा 468 के अंतर्गत लिमिटेशन के दायरे में प्रतिबंधित नहीं होती : कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत दायर की गयी अर्जी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 468 के अंतर्गत निर्धारित समय सीमा (लिमिटेशन पीरियड) के दायरे से प्रतिबंधित नहीं होती है।

न्यायमूर्ति के एस मुद्गल की एकल पीठ ने कहा,

"जब घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत दायर अर्जी 'अपराध' शब्द के तहत नहीं आती, तो सीआरपीसी की धारा 468 लागू नहीं होती। इसलिए घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के अंतर्गत दायर अर्जी पर सीआरपीसी की धारा 468 का लागू होना स्पष्ट तौर से गलत धारणा है।"

कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धाराएं 468 (एक) और 468 (दो) (बी) बताती हैं कि संज्ञान लेने के लिए लिमिटेशन का प्रतिबंध एक अपराध से जुड़ा है। सीआरपीसी की धारा 468 केवल तभी लागू होती है, यदि कोई अपराध हुआ है। यदि कोई अपराध नहीं है, तो लिमिटेशन प्रतिबंध भी लागू नहीं होता।

कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत घरेलू हिंसा को अपराध के तौर पर नहीं समझा जाता। इसमें कोर्ट द्वारा राहत दिये जाने के प्रावधान हैं, न कि दोषसिद्धि और सजा के प्रावधान।

फैसले में कहा गया है,

"सीआरपीसी की धारा 468 के प्रावधान लागू करने के लिए, निश्चित तौर पर संबंधित आरोप को एक अपराध होना चाहिए। घरेलू हिंसा कानून के तहत अपराध उस तरह परिभाषित नहीं है, जैसा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 40 के तहत परिभाषित है।"

न्यायमूर्ति मुद्गल ने कहा,

"घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 केवल इस बात के लिए जांच सुनिश्चित करने वाला प्रावधान है कि क्या संबंधित कार्य या चूक हुई है?"

कोर्ट ने अंत में कहा,

"घरेलू हिंसा कानून की धारा 31 यह स्पष्ट करती है कि इस कानून की धारा 12 के तहत पारित संरक्षण आदेश या अंतरिम संरक्षण आदेश का उल्लंघन ही अपराध होता है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि घरेलू हिंसा कानून की धारा 31 के तहत विचारित कार्य या चूक अपराध है और घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 के तहत अर्जी अपराध नहीं है।"

कोर्ट ने यह आदेश पुत्ताराजू नामक व्यक्ति की ओर से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए जारी किया, जिसने एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा 11 अप्रैल, 2016 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी और बच्चों के भरण पोषण और घर किराये के तौर पर आठ हजार रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया गया था।

पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे चार लाख 32 हजार रुपये की राशि जमा कराने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने उक्त राशि मजिस्ट्रेट कोर्ट में हस्तांतरित करने का निर्देश दिया था, जहां से पत्नी इस राशि को निकाल सकती थी। पत्नी ने राशि निकासी की अनुमति के लिए अर्जी दायर की थी, जिसे उसके पति ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि याचिका कथित घरेलू हिंसा की तारीख के 10 साल बाद दायर की गयी थी, इसलिए याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी।

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