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'किसी अंडरट्रायल को अभियोजन की दया के भरोसे, असीमित अवधि के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता' : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कोर्ट के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश के मामले में विदिशा एसपी को लगाई फटकार

LiveLaw News Network
7 Oct 2020 10:58 AM GMT
किसी अंडरट्रायल को अभियोजन की दया के भरोसे, असीमित अवधि के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कोर्ट के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश के मामले  में विदिशा एसपी को लगाई फटकार
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार (1 अक्टूबर) को कहा कि अभियोजन की दया के भरोसे एक अंडर ट्रायल को असीमित अवधि के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता है।

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया की खंडपीठ ने विदिशा के पुलिस अधीक्षक को भी फटकार लगाई है क्योंकि उन्होंने ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्रों की सत्यता को चुनौती देने की कोशिश के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए देशव्यापी लाॅकडाउन को भी चुनौती देने की कोशिश की थी। वहीं न्यायालय के अधिकार को कमजोर करने का भी प्रयास किया था।

कोर्ट के समक्ष मामला

कोर्ट आरोपी की तरफ से जमानत दिए जाने की मांग करते हुए सीआरपीसी की धारा 439 के तहत दायर सातवें आवेदन पर सुनवाई कर रही थी।

आवेदक को पुलिस स्टेशन लटेरी, जिला विदिशा द्वारा पंजीकृत अपराध संख्या 254/2016 के संबंध में 22 दिसम्बर 2016 को गिरफ्तार किया था। यह मामला आईपीसी की धारा 327/34, 506-बी, 294,323,302/34 के तहत किए गए अपराध के संबंध में दर्ज किया गया था।

आवेदक के खिलाफ आरोप है कि उसने सह-अभियुक्त के साथ मिलकर मृतक मुकेश से शराब खरीदने के लिए पैसे मांगे थे और जब उसने पैसे देने से इनकार कर दिया, तो उसके सिर पर लाठी से हमला कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई थी।

पृष्ठभूमि

इससे पहले, आवेदक ने मामले की सुनवाई में हो रही देरी के आधार पर जमानत देने के लिए एक आवेदन दायर किया था, जो कि एम.सीआर.सी नंबर 37605/2019 के तहत दायर किया गया था।

कोर्ट ने पाया कि पुलिस विभाग ने डॉक्टरों और पुलिस के गवाहों सहित अन्य गवाहों के खिलाफ जारी किए गए समन /जमानती वारंट / वारंट को निष्पादित करने में घोर लापरवाही बरती है। इसलिए पुलिस अधीक्षक, विदिशा को निर्देश दिया गया था कि वे अदालत में पेश हों और उनके अधीनस्थों की तरफ से बरती गई इस तरह की लापरवाही पर अपना पक्ष रखें।

श्री विनायक वर्मा, एस.पी., विदिशा 16 सितम्बर 2019 को न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए थे और अदालत को आश्वासन दिया था कि भविष्य में उनके अधीनस्थों की ओर से कोई लापरवाही नहीं होगी।

हालांकि, आवेदक के अनुसार इसके बाद भी मामले की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ, और एक बार फिर डॉक्टरों और पुलिस कर्मियों के खिलाफ जारी किए गए समन /जमानती वारंट/वारंट वापस लौट आए।

आवेदक ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्र की एक प्रति भी दायर की। इसलिए, पुलिस अधीक्षक, विदिशा को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया था।

जिसके बाद श्री वर्मा, एसपी, विदिशा द्वारा प्रस्तुत किया गया था, वास्तव में पुलिस के गवाहों की ओर से कोई लापरवाही नहीं हुई है और अपनी दलीलों को पुष्ट करने के लिए, श्री वर्मा, एसपी विदिशा ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश की सत्यता को ही चुनौती दे दी।

ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्र को चुनौती देने के लिए दिए गए आधार

श्री वर्मा, एस.पी., विदिशा ने 16 सितम्बर 2019 को एम.सीआर.सी नंबर 37605/2019 में आश्वासन दिया था। जिसके बाद 19 सितम्बर 2019 को मामला आगे की सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन फिर भी गवाहों के खिलाफ जारी किए गए वारंट वापस आ आए।

4 दिसम्बर 2019 को, डॉक्टर राजेंद्र और पुलिस गवाह पेश नहीं हुए थे, इसलिए उनके खिलाफ फिर से वारंट जारी किए गए थे और मामले में आगे की सुनवाई करने के लिए 15 जनवरी 2020 की तारीख तय की थी।

4 दिसम्बर 2019 के आदेश पत्र की सत्यता को चुनौती देते हुए, श्री वर्मा, एसपी, विदिशा की तरफ से प्रस्तुत किया गया था कि वास्तव में डॉ राजेंद्र और उप-निरीक्षक न्यायालय के समक्ष उपस्थित थे, परंतु एक वकील के आकस्मिक निधन के रेफरेंस के कारण उस दिन न्यायालय में कामकाज निलंबित कर दिया गया था।

जब श्री वर्मा, एसपी, विदिशा को निर्देश दिया गया कि वह बताए कि क्या आदेश पत्र में उपर्युक्त दो गवाहों की उपस्थिति का उल्लेख किया गया था या नहीं?, तो आदेश पत्र को देखने के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि इन दो गवाहों की उपस्थिति का उल्लेख नहीं है।

इसके अलावा, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन दो गवाहों ने भी आदेश पत्र के मार्जिन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

इस प्रकार, अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट था कि श्री वर्मा, एस.पी., विदिशा ने बिना किसी आधार के यह दलील देने की कोशिश की थी कि ट्रायल कोर्ट ने एक गलत आदेश पत्र दर्ज किया था।

''मामले की निगरानी नहीं की''

इसके अलावा श्री वर्मा, एसपी, विदिशा ने यह भी प्रस्तुत किया था कि पुलिस विभाग सिर्फ मार्च 2020 तक मामले की सुनवाई में हुई देरी के लिए जिम्मेदार है, लेकिन बाद में ट्रायल कोर्ट 3 अप्रैल 2020 को बंद हो गई थी अन्यथा उनके शेष दो पुलिस गवाह कोर्ट में पेश हो जाते।

न्यायालय ने कहा कि श्री वर्मा, एस.पी., विदिशा द्वारा जिस तरह से यह दलील दी गई थी कि उससे यह स्पष्ट था कि वह न्यायालय पर यह दोष डालने की कोशिश कर रहा था कि 3 अप्रैल 2020 से न्यायालय बंद थे, इसलिए अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज नहीं हो पाए।

हालांकि श्री वर्मा, एस.पी., विदिशा अपने इस विश्वास के लिए कोई कारण नहीं बता सके, क्योंकि उन्होंने काफी हद तक इस बात को स्वीकार किया है कि 16 सितम्बर 2019 को इस अदालत के समक्ष आश्वासन देने के बाद, उन्होंने इस मामले की निगरानी नहीं की।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

कोर्ट ने कहा कि-

''एक बात स्पष्ट है कि 16 सितम्बर 2019 को इस न्यायालय के समक्ष आश्वासन देने के बाद, न तो श्री वर्मा, एसपी, विदिशा ने वर्तमान मामले की निगरानी करने की कोशिश की और न ही उनके किसी राजपत्रित अधिकारी ने पुलिस मुख्यालय की तरफ से 30 मार्च 2019 को जारी सर्कुलर के अनुपालन के लिए कोई कार्य किया। 16 सितम्बर 2019 के बाद अपने घोर लापरवाह और गैरजिम्मेदाराना आचरण के बावजूद, श्री वर्मा, एस.पी., विदिशा ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्र की सत्यता को चुनौती देने के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए देशव्यापी बंद को भी चुनौती देने की कोशिश की। वहीं न्यायालय के अधिकार को भी कमजोर करने का प्रयास किया।''

इसलिए, अदालत ने उल्लेख किया कि यह स्पष्ट है कि श्री वर्मा, एसपी, विदिशा को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक अभियुक्त को मिले मौलिक अधिकार (मामले की जल्द सुनवाई)के प्रति कोई सम्मान नहीं है। इतना ही नहीं 16 सितम्बर 2019 के बाद उन्होंने जो गैरजिम्मेदार रवैया और लापरवाही दिखाई है,उसके लिए भी कोई पश्चाताप है।

इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी माना कि-

''अभियोजन की दया के भरोसे एक अंडर ट्रायल को असीमित अवधि के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता है। इन परिस्थितियों में, जब आवेदक 22 दिसम्बर 2016 से जेल में है और अभियोजन ने ट्रायल को जल्दी पूरा करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है, इस न्यायालय के पास आवेदक को जमानत देने के लिए सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं है।''

अंत में, न्यायालय ने सक्षम प्राधिकारी के विवेक पर यह विचार करने के लिए छोड़ दिया कि क्या श्री वर्मा, एस.पी., विदिशा के गैरजिम्मेदाराना और लापरवाहीपूर्ण कार्य के लिए उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई बनती है या नहीं?

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि यह मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश राज्य और पुलिस महानिदेशक के विचार करने के लिए छोड़ा जा रहा है कि क्या ट्रायल कोर्ट के समक्ष मामले के गवाह डॉक्टर और पुलिस कर्मी के पेश न होने पर उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई बनती है या नहीं?

अन्त में, कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह इस आदेश की एक प्रति श्री विनायक वर्मा, पुलिस अधीक्षक, विदिशा की सेवा पुस्तिका में रख दें।

साथ ही न्यायालय ने आदेश दिया है कि आदेश की तिथि से 15 दिनों की अवधि के भीतर इस न्यायालय के प्रधान रजिस्ट्रार के समक्ष एक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जाए।

आदेश की काॅपी यहां से डाउनलोड करें।



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