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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एलएलएम के 3 छात्रों के परिणाम घोषित करने का आदेश दिया, बीबीडी यूनिवर्सिटी ने फीस जमा न करने पर रिज़ल्ट रोका था

Sharafat
4 Aug 2022 3:17 PM GMT
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एलएलएम के 3 छात्रों के परिणाम घोषित करने का आदेश दिया, बीबीडी यूनिवर्सिटी ने फीस जमा न करने पर रिज़ल्ट रोका था
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ में बाबू बनारसी दास (बीबीडी) यूनिवर्सिटी को 3 एलएलएम छात्रों के परिणाम घोषित करने का निर्देश दिया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इन छात्रों का परीक्षा परिणाम फीस का भुगतान न करने पर रोक दिया था।

जस्टिस पंकज भाटिया की खंडपीठ रवि सारथी और 2 अन्य छात्रों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो बीबीडी यूनिवर्सिटी के आपराधिक और सुरक्षा कानून ( Criminal and Security Law) में विशेषज्ञता के साथ मास्टर ऑफ लॉ डिग्री कर रहे हैं।

अपनी याचिका में उन्होंने दावा किया कि उक्त पाठ्यक्रम के लिए फीस 86,500 रुपये थी, जिसमें से याचिकाकर्ता पहले ही 46,500 रुपये का भुगतान कर चुके हैं, हालांकि, लगभग 40,000 / - का भुगतान किया जाना बाकी था, इसलिए उनके परीक्षा परिणाम यूनिवर्सिटी प्रशासन ने रोक दिया है। याचिकाकर्ता COVID 19 महामारी के कारण पूरी फीस जमा नहीं कर सके।

अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं के वकील पन्ना लाल गुप्ता ने तर्क दिया कि यूजीसी, साथ ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने यूनिवर्सिटी को दिशानिर्देश जारी कर कहा है कि वे उन छात्रों के संबंध में फीस के भुगतान से संबंधित मुद्दे पर पुनर्विचार करें, जो COVID 19 स्थिति के दौरान प्रभावित रहे।

यहां यह ध्यान दिया जा सकता है कि जुलाई 2020 में, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने महामारी के मद्देनज़र में छात्रों की कठिनाइयों के प्रति दयालु और विचारशील होने के लिए कानूनी शिक्षा केंद्रों को एक एडवाइज़री जारी की थी।

बार काउंसिल ने कानूनी शिक्षा के सभी केंद्रों को निम्नलिखित विशिष्ट निर्देश जारी किए थे, जबकि आम तौर पर कानूनी शिक्षण संस्थानों को छात्रों के प्रति विचारशील होने और इन असाधारण परिस्थितियों के दौरान उन्हें मदद करने के लिए सलाह दी थी। यह इस प्रकार थी।

1. एक बार में एकमुश्त भुगतान के बजाय आसान किश्तों में फीस के भुगतान के लिए वैकल्पिक लचीली योजना तैयार करना।

2. फिज़िकल रूप से अनुपस्थिति के कारण बचाई जा रही बिजली और बुनियादी ढांचे के रखरखाव पर आनुपातिक खर्च कम करके देय शुल्क को समायोजित करना।

3. महामारी के कारण कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए फीस के भुगतान से संबंधित छात्रों द्वारा किसी भी विशिष्ट अनुरोध (अनुरोधों) पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना।

4. परेशान छात्रों की मदद करना और फीस पर कोई जुर्माना नहीं लगाना और फीस का भुगतान करने में असमर्थता के मामले में उन्हें ऑनलाइन क्लास में भाग लेने से नहीं रोकना।

हालांकि इस वर्तमान मामले में याचिकाकर्ताओं के वकील ने प्रस्तुत किया कि यूजीसी और बीसीआई द्वारा जारी उपरोक्त दिशानिर्देशों के अनुसार, यूनिवर्सिटी ने आज तक कोई निर्णय नहीं लिया है।

वकील का दूसरा तर्क यह था कि उनके परिणाम यूनिवर्सिटी को सबसे अच्छी तरह से ज्ञात कारणों के लिए घोषित नहीं किए जा रहे थे, शायद फीस का भुगतान न करने के कारण यूनिवर्सिटी ने ऐसा किया।

दूसरी ओर यूनिवर्सिटी की ओर से पेश वकील अखिलेश कालरा ने अदालत के समक्ष कहा कि यदि परिणाम घोषित किए जाते हैं तो फीस वसूल करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, उन्होंने सहमति व्यक्त की कि यूनिवर्सिटी यूजीसी के साथ-साथ बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा दिए गए निर्देशों के आलोक में याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए प्रतिनिधित्व के संबंध में निर्णय लेगी।

इन प्रस्तुतियों के मद्देनजर न्यायालय की राय थी कि याचिकाकर्ताओं के परिणामों की घोषणा न करने का कोई कारण नहीं है, इसलिए याचिका का निपटारा प्रतिवादियों को निर्देश देने के साथ किया गया।

बेंच ने निर्देश दिए कि यूनिवर्सिटी को याचिकाकर्ताओं के परीक्षा परिणाम एक सप्ताह के भीतर घोषित करे।

कोर्ट ने यूजीसी के साथ-साथ बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधित्व पर तीन सप्ताह की अवधि के भीतर फैसला करने को भी कहा।

अदालत ने कहा,

" प्रतिवादी -यूनिवर्सिटी याचिकाकर्ताओं की डिग्री को तब तक अपने पास रखने की हकदार होगी जब तक कि निर्णय नहीं हो जाता और परिणामी कार्रवाई नहीं होती है।"

केस टाइटल - रवि सारथी और 2 अन्य बनाम मुख्य सचिव उच्च शिक्षा, लखनऊ के माध्यम से उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य [WRIT - C No. - 5028/2022]

साइटेशन : 2022 लाइव लॉ (एबी) 356


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