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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिकित्सा उपचार के दौरान पत्नी की मृत्यु पर दु:ख व्यक्त करते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिखने वाले शख्स के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई

LiveLaw News Network
24 July 2021 5:49 AM GMT
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिकित्सा उपचार के दौरान पत्नी की मृत्यु पर दु:ख व्यक्त करते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिखने वाले शख्स के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी, जिस पर एक सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी पत्नी की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए फेसबुक पर पोस्ट लिखने खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की पीठ अशोक गौतम की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसके खिलाफ एक फेसबुक पोस्ट से संबंधित आरोप के मामले में कार्यवाही शुरू की गई है।

याचिकाकर्ता ने अपनी पोस्ट में चिकित्सा उपचार के दौरान अपनी पत्नी की मृत्यु पर दुख व्यक्त किया और इसके बाद याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 504, 507 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66,67-ए और उत्तर प्रदेश मेडिकेयर सेवा व्यक्ति और चिकित्सा सेवा संस्थान (हिंसा की रोकथाम और संपत्ति को नुकसान) अधिनियम की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया गया।

गौतम की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि आवेदक ने 21 सितंबर, 2020 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला मेरठ को चिकित्सा उपचार के दौरान अपनी पत्नी की मौत से संबंधित मामले के संबंध में एक शिकायत की थी।

इसलिए यह प्रस्तुत किया गया कि पूरी कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण है और केवल उसे परेशान करने की दृष्टि से है।

कोर्ट ने देखा कि प्रथम दृष्टया मामले पर विचार करने की आवश्यकता है। न्यायालय ने 1 सितंबर, 2021 तक राज्य को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया।

इस बीच सूचीबद्ध करने की अगली तिथि तक अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-प्रथम मेरठ की अदालत में लंबित आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी गयी है।

कोर्ट ने हाल ही में कहा था कि COVID-19 प्रोटोकॉल के उल्लंघन के बारे में समाज के निवासी द्वारा एक सतर्क ट्वीट सीआरपीसी की धारा 144 के तहत पारित निषेधात्मक आदेशों का उल्लंघन नहीं हो सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था जिसने ट्वीट किया था कि नौकरानियां बिना हाथों को सेनिटाइज किए उसके सोसायटी में आती हैं।

न्यायमूर्ति जे जे मुनीर की खंडपीठ ने कहा था कि COVID-19 प्रोटोकॉल के उल्लंघन के बारे में एक जानकारी जिसकी जांच जरूरी है, गलत पाई जा सकती है और पुलिस को गलत जानकारी देने के बारे में किसी भी अपराध को जन्म नहीं दे सकती है।

केस का शीर्षक - अशोक कुमार गौतम बनाम यू.पी. राज्य एंड अन्य

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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