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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मध्यस्थता कार्यवाही के निपटान की 12 महीने की अवधि को बढ़ाया, कैदियों को व्यक्तिगत बॉन्ड पर ज़मानत देने की अनुमति दी

LiveLaw News Network
6 April 2020 10:02 AM GMT
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मध्यस्थता कार्यवाही के निपटान की 12 महीने की अवधि को बढ़ाया, कैदियों को व्यक्तिगत बॉन्ड पर ज़मानत देने की अनुमति दी
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देशव्यापी लॉकडाउन के मद्देनजर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29 ए के तहत निपटान के लिए निर्धारित 12 महीने की अवधि को बढ़ा दिया, ताकि मध्यस्थ न्यायाधिकरण, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के अलावा अन्य मामलों में फाइनल अवॉर्ड पारित कर सके।

नॉवेल कोरोना वायरस (COVID-19) के खतरे के कारण लॉकडाउन के मद्देनज़र स्वत: संज्ञान लेकर दर्ज मुकदमे में चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा की बेंच ने कहा,

"मध्यस्थता और सुलह अधिनियम 1996 की धारा 29 ए के प्रावधानों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता के अलावा अन्य मैटर में अवॉर्ड धारा 23 की उप-धारा (4) के तहत याचिका के पूरा होने की तारीख से बारह महीने की अवधि के भीतर किए जाने की आवश्यकता है।

अधिनियम की धारा 29A की आवश्यकता अनिवार्य है। हालांकि, असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए, उपरोक्त अवधि का विस्तार करना वांछनीय है।

तदनुसार, यह निर्देशित किया जाता है कि यदि किसी भी मध्यस्थ कार्यवाही में अधिनियम की धारा 23 की उपधारा (4) के तहत दलीलें पूरी हो गई हैं और 25 मार्च, 2020 को या उसके बाद बारह महीने की अवधि समाप्त हो गई है या समाप्त होने वाली है तो उसे 25 मई, 2020 तक बढ़ाया जाता है। "

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ज़मानतदार की अनुपलब्धता के कारण कई जमानत आदेश निष्पादित नहीं किए गए। इस प्रकार, लॉकडाउन के कारण ज़मानत की व्यवस्था में "बाधाओं" पर विचार करते हुए, बेंच ने अस्थायी रूप से 15 मार्च या उसके बाद जमानत देने वाले व्यक्तियों द्वारा ज़मानत पेश करने में छूट दी और निर्देश दिया कि उन्हें व्यक्तिगत बॉन्ड प्रस्तुत करने पर रिहा किया जाए।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया,

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत शक्तियों को आह्वान करते हुए, ज़मानतदार के कारण व्यवस्था में अवरोधों को देखते हुए, हम यह आदेश देना उचित समझते हैं कि सभी आरोपी आवेदक -2- जिनकी जमानत की अर्जी को 15 मार्च, 2020, या उसके बाद अनुमति दी जानी थी, लेकिन ज़मानतदार उपलब्ध नहीं होने के कारण रिहा नहीं किया गया है, उन्हें अदालत के आदेश से या जेल अधिकारियों के संतुष्ट होने पर बॉन्ड पर छोड़ा जा सकता है। "

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